पोखर सूखे, कैसे बुझेगी प्यास

पोखर सूखे, कैसे बुझेगी प्यासगर्मी के दस्तक देने के साथ ही क्षेत्र में पेयजल संकट गहराने लगा है।

महेन्द्र सिंह, स्वयं प्रोजेक्ट

उन्नाव । गर्मी के दस्तक देने के साथ ही क्षेत्र में पेयजल संकट गहराने लगा है। एेसे में प्रमुख संसाधन के रूप में पेयजल आपूर्ति हेतु उपयोग किए जाने वाले हैंडपंपों के जवाब देने का सिलसिला शुरू हो गया है। वहीं जल संरक्षण के उद्देश्य से करोड़ों रूपये की योजना के तहत खुदवाए गए तालाब व पोखर पानी के आभाव में अनुपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।

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मवेशियों व आवारा जानवरों के लिए पीने के पानी का आश्रय इन तालाब व पोखरों में अधिकांश के सूखे होने से क्षेत्र के पशुपालकों को भी खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। तहसील क्षेत्र के स्थानीय पाटन सहित, सुमेरपुर, बिहार, रावतपुर, कोटवर, सहिला, गौरा, पकराखुर्द आदि गांवों के तालाबों व पोखरों की खुदाई मनरेगा के तहत की गई थी।

जल संचित करने योग्य बनाने के साथ ही कई जलाशयों का सौंदरीकरण कर माडल तालाब की संज्ञा भी दी गई। उदेश्य था तालाबों का गहरीकरण कर उनमें बारिश का जल संरक्षित करने का व जलस्तर का संतुलन बनाए रखना। इसके साथ ही गर्मी के दिनों में पशु पक्षियों को पानी के लिए भटकना न पड़े, जरूरत पड़ने पर जलाशयों के जल का समुचित उपयोग किया जा सके। किंतु मौजूदा समय में अधिकांश जलाशयों में पानी की जगह धूल उड रही है।

गर्मी की शुरुआत होने तक ज्यादातर तालाब सूख चुके हैं। वहीं जिनमे आंशिक रूप से पानी था वह भी गर्मी की शुरुआत होते ही सूखे की कगार पर पहुंच गए हैं। क्षेत्रीय निवासी विक्रम सिंह, मुन्ना सिंह,श्यामू तिवारी, सुबोध सिंह, राकेश निर्मल, रवि शंकर सिंह भदिहा, राहुल सिंह, रणवीर सिंह आदि ने बताया कुछ गिने—चुने जलाशयों को छोडक़र सभी सूखे पड़े हैं। गर्मी से हलकान पशु पक्षियों को प्यास बुझाने के लिए दरबदर भटकना पड़ रहा है। पेयजल की समस्या विकराल होती जा रही है। क्षेत्रवासियों ने शासन—प्रशासन से सूखे पड़े जलाशयों में पानी भरवाए जाने की मांग की है।

बदहाली के दौर से गुजर रहे माडल तालाब

क्षेत्र में लाखों रूपए की लागत से बने माडल तालाब कुछ ही समय में बदहाली की कगार पर पहुंच चुके। कुंदनपुर, सुमेरपुर, सहिला, कोटवर आदि गावों में बने माडल तालाबों का पुरसाहाल कोई नहीं है। देखभाल के आभाव में इनमें लगाए पौधे सूख गए हैं गए हैं। ट्री गार्ड, व बैठने के लिए बनाए गए बेंच आदि गायब हो गए हैं या उपद्रवियों द्वारा तोड दिए गए हैं। कहीं इन सूखे तालाबों का उपयोग बच्चे खेल के मैदान के रूप में कर रहे हैं तो कहीं इनसे मिट्टी का अवैध खनन कर स्वरूप बिगाड़ा जा रहा है। खास बात यह कि इन सब के बीच प्रशासन मूक दर्शक की भूमिका अख्तियार किए है।

पुराना स्वरूप पाने की बाट जोह रहे प्राचीन तालाब

जल संरक्षण के उद्देश्य से जलाशयों को सुधारने व संवारने में योजनाआें के माध्यम से करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं पर अब भी कई एेसे प्राचीन तालाब हैं जो अपना अस्तित्व खोने के बाद भी आकर्षण का केंद्र हैं। इन्हें जरूरत है मरम्मत की। इन्ही में से एक कस्बा का नरबदेश्वर महादेव मंदिर के निकट स्थित पुराना पक्का तालाब समय के साथ ही रखरखाव के आभाव में अपने मूल स्वरूप को खोता जा रहा है। बुजुर्ग बताते हैं कि मन्दिर के निकट होने के कारण यहां तालाब में बने घाटों पर नित्य सैकड़ों लोग ान किया करते करते थे।

इसमें पूरा साल पानी की कमी नहीं होती थी। समय बीतने के साथ ही यह उजाड़ होता गया। अब इस तालाब को मरम्मत की दरकार है। पक्की सीढियों से सुसज्जित यह तालाब यहां से गुजरने वाले लोगों का अनायास ही ध्यान आकर्षित कर लेता है। लोग तालाब की जीर्ण-शीर्ण दशा देख जीर्णोद्घार की की दरकार बताते हैं।

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