दवाई खाकर रातभर पढ़ना बच्चों में डाल रहा नशे की लत

दवाई खाकर रातभर पढ़ना बच्चों में डाल रहा नशे की लतपरीक्षा नजदीक आने पर रातभर जगने के लिए बच्चे ले रहे एनर्जी ड्रिंक्स, स्ट्रांग कॉफी और कैफीन युक्त गोलियां

मोहित कुमार सैनी, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

मेरठ। बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में जुटे बच्चे देर रात तक जागकर पढ़ने के लिए स्ट्रांग कॉफी के अलावा एनर्जी ड्रिंक्स और कैफीन युक्त गोलियों का सहारा ले रहे हैं। इससे वो नशे के आदी हो रहे हैं।

मेरे पास इस तरह के केस आए हैं, जिनमें स्टूडेंट नींद खोलने के लिए कोई उपाय पूछते हैं। मैं उनको यहीं एडवाइस देता हूं कि वह अपनी नींद को पूरा ले और फ्री माइंड होकर पढ़ाई करें। क्योंकि टेंशन लेने से याद किया हुआ भी भूल जाते हैं। इसलिए टेंशन नहीं लेनी चाहिए।
राजेंद्र कुमार, होम्योपैथिक डॉक्टर

चिकित्सकों के अनुसार इन चीजों का प्रयोग बच्चों को नशे का आदी बना सकता है। सीबीएसई, आईसीएसई और यूपी बोर्ड की परीक्षाएं फरवरी से शुरू होने वाली हैं। परीक्षाओं को लेकर छात्र-छात्राओं में काफी तनाव है। देर रात तक पढ़ना भी उनकी मजबूरी है।

सीबीएसई बोर्ड के विज्ञान वर्ग के छात्र अरुण शर्मा ने बताया, “मुझे डर के मारे रात रातभर नींद नहीं आती है। जब भी नींद आती है तो उसके लिए मैं कोई एनर्जी ड्रिंक या फिर कुछ स्ट्रांग टी या काफी पी लेता है।” यूपी बोर्ड से हाईस्कूल की परीक्षा देने वाली आरती सिंह ने बताया, “अब दिन भी बहुत कम बचे हैं, पढ़ाई करने के लिए रातभर जागना पड़ता है।”

विशेषज्ञों के अनुसार एनर्जी ड्रिंक्स में 20 से लेकर 30 फीसदी निकोटिन होता है। गोंडा के मुख्य चिकित्साधिकारी उमेश सिंह यादव बताते हैं, “लगातार जगने से दिमाग और शरीर दोनों पर गलत असर पड़ता है। इससे दिमाग भी कमज़ोर हो जाता है और शरीर भी कमजोर हो जाता है। इससे जितना उनको याद होनी चाहिए उसकी रफ्तार कम हो जाती है। छात्र जगने के लिए एनर्जी बूस्टर, एनर्जी ड्रिंक और ड्रग्स लेते हैं। इन ड्रिंक्स से कुछ देर के लिए उनका दिमाग सक्रिय हो जाता है।”

कुछ दवाएं व ड्रिंक्स ऐसी भी है जिनको लेते समय हम यह भी नहीं सोचते कि उनका नुकसान भी हो सकता है। बाद में ब्लड प्रेशर, दिमाग पर असर होना व हार्ड पर असर होना या फिर लीवर कमजोर होना आदि बीमारियों का सामना करना पड़ता है।
डॉ. तनुराज सिरोही, फिजीशियन

वो आगे बताते हैं, “दिमाग सक्रिय होने से उनको चीज़े जल्दी-जल्दी याद होने लगती है। जैसे ही दवाइयों का असर खत्म होता है, उनकी यादाश्त शक्ति कमजोर हो जाती है। परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों को नियमित छह से आठ घंटे की नींद लेनी चाहिए।” एनर्जी ड्रिंक्स विभिन्न फ्लेवर में आती हैं। फिजिशियन डॉ. अनूप श्रीवास्तव के अनुसार, जितनी गाढ़ी ड्रिंक होगी उतना ही निकोटिन की मात्रा अधिक होने की संभावना है।

फिजिशियन डॉ. राजीव गुप्ता बताते हैं, “बाजार में विभिन्न नींद खोलने वाली गोलियां आ रही हैं, जिनमें 10 से 20 प्रतिशत कैफीन होता है। इसके अलावा बाजार में कैफीन की गोलियां मौजूद हैं. जिन्हें नींद न आए, इसके लिए लिया जा रहा है।” दिन में स्कूल-कोचिंग होने के कारण छात्रों को देर रात तक पढ़ना पड़ता है। रजबन निवासी स्नेहा वर्मा ने बताया, “मेरी बेटी और बेटा दोनों ही रात को जागकर पढ़ाई करते हैं।

दिन में उनकी ट्यूशन होती है इसलिए उन्हें रात को जागना मजबूरी है।” होम्योपैथिक डॉ. सरिता शर्मा ने बताया, “बाजार में आजकल कुछ निकोटिन च्वींगम आई हुई हैं। अक्सर यह सोच रहती हैं कि नींद खोलने के लिए किसी तरह से मुंह चलता रहना जरूरी है, इसलिए यह च्वींगम भी यूज की जा रही हैं। इसके अलावा स्टूडेंट रातभर में आठ से दस कप स्ट्रांग काफी या टी रोज की ले रहे हैं। जो कि लिमिट से ज्यादा है, इनमें भी काफी मात्रा में निकोटिन होता है।”

मेरे पास आजकल दस में छह केस इसी तरह के आ रहे हैं। जिनमें स्टूडेंट पढ़ाई की चिंता में डिप्रेशन में जा रहे हैं। मैं बच्चों के साथ ही उनके पेरेंट्स को भी एडवाइस देती हूं। क्योंकि पेरेंट्स भी दूसरों की तुलना में बच्चों पर प्रेशर ढालते हैं। जो कि गलत है।
डॉ. पूनम देवदत्त, मनोवैज्ञानिक

फिजिशियन डॉ. अमित सिंह ने बताया, “निकोटिन युक्त एनर्जी ड्रिंक या सीरप या नींद खोलने की दवाएं लेने से हमारी याद्दाश्त पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है। अगर 12 से लेकर 15 साल तक की आयु में लगातार इसका सेवन किया जाए तो सुबह परीक्षा के दौरान छात्र को याद किए हुए का प्रतिशत ही याद रहेगा। ऐसे में आने वाले दस बीस सालों में सोचने समझने की क्षमता खत्म होती जाएगी।” वो आगे बताते हैं कि अगर कोई लिमिट से ज्यादा सेवन कर लें तो उसको ब्रेन हैम्रेज होने के भी चांस होते हैं। कैफीन औैर निकोटिन के अधिक इस्तेमाल से आलस्य आना, डिप्रेशन, ब्लडप्रेशर, पाचन क्रिया खराब होने की संभावना है।”

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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