ये ग्रामीण माएं खुद साक्षर होकर अपनी बहू और बेटियों को भी बना रहीं साक्षर

Neetu SinghNeetu Singh   14 May 2017 7:23 PM GMT

ये ग्रामीण माएं खुद साक्षर होकर अपनी बहू और बेटियों को भी बना रहीं साक्षरग्रामीण महिलाओं ने पढ़ने के लिए समाज के तानों को अनसुना करते हुए पढाई जारी रखी।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

सीतापुर-औरैया । ये वो माएं हैं जिन्होंने अपनी उम्र की परवाह न करते हुए न सिर्फ पल्लू में कॉपी छिपाकर पढ़ाई शुरू की बल्कि पांचवीं की परीक्षा देकर सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया । आज ये अपनी बहु और बेटियों को भी साक्षर बना रही हैं ।

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“हमारे माँ-बाप ने हमे पढ़ाया नहीं क्योंकि उन्हें लगता था लड़की को पराये घर जाना है और चूल्हा चौका करना है, ससुराल में भी कोई पढ़ा लिखा नहीं था, मेरे गाँव की महिलाएं जब एक छप्पर के नीचे पढ़ने लगी तो मैं भी साड़ी के पल्लू में कॉपी-कलम लेकर आने लगी ।’’ ये कहना है सीतापुर जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर पश्चिम-दक्षिण में पिसावां ब्लॉक के अल्लीपुर गाँव की रहने वाली साठ वर्षीय सुन्दरकली का ।

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वो आगे बताती हैं, “सब कहतें थे ये ऐसे पढ़ाई कर रही हैं जैसे बुढ़ापे में पढ़ लिखकर इन्हें नौकरी करनी हो, इन सब बातों का ध्यान न देते हुए हमने गिनती और पहाड़ा सीखा और पांचवी की परीक्षा भी दी, बुढ़ापे में ही सही पर आज हमारे पास कक्षा पांचवी पास मार्कसीट है ।’’ सुन्दरकली प्रदेश की पहली महिला नहीं है जिन्होंने उम्र की इस दहलीज में जाकर पढ़ाई की हो बल्कि इनकी तरह हजारों महिलाओं ने पढ़ाई की और आज ये अंगूठा न लगाकर हस्ताक्षर कर रही हैं और अपनी बहु-बेटियों को भी पढ़ा रहीं हैं ।

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महिला समाख्या की एक कोशिश थी कि प्रदेश की हर महिला साक्षर हो और सवाल करना सीखे । महिलाओं को साक्षर करने के लिए महिला समाख्या द्वारा प्रदेश के 16 जिलों में 2,000 से ज्यादा महिला साक्षरता केंद्र खोले गये जिसमे प्रदेश की हजारों महिलाओं ने पल्लू में कॉपी पेन छिपाकर पढ़ाई शुरू की, और पांचवीं की परीक्षा पास की ।इन महिलाओं ने पढ़ाई के लिए न सिर्फ समाज से लड़ाई लड़ी बल्कि अपनों के भी ताने सुने पर हार नहीं मानी ।

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मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के मुताबिक वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की साक्षरता दर 72.99प्रतिशत है। इसमें पिछले 10 वर्षों की अवधि में समग्र साक्षरता दर में 8.15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2001 में 64.84 प्रतिशत थीं वहीं2011 में 72.99 प्रतिशत हुई है ।

महिला सामाख्या की राज्य परियोजना निदेशक डॉ स्मृति सिंह बताती हैं, “ग्रामीण महिलाएं अपने हक के लिए खुद सवाल करना सीखें इसके लिए इनका साक्षर होना बहुत जरूरी था, दो हजार से ज्यादा साक्षरता केन्द्रों पर हजारों महिलाओं ने न सिर्फ ककहरा और एबीसीडी सीखी बल्कि आठवीं-दसवीं की परीक्षा भी पास की, इनमे से कई महिलाओं ने स्नातक भी किया ।’’ वो आगे बताती हैं, “आज ये महिलाएं साक्षर होकर पंचायत, क़ानून, अधिकार, बाल विवाह, दहेज प्रथा जैसे कई मुद्दों पर गाँव-गाँव जाकर लोगों को भी जागरूक भी कर रही हैं ।’’

औरैया जिले के सहार ब्लॉक की रहने वाली शकीला बानो (28 वर्ष) बताती हैं, “मैंने कभी स्कूल का मुंह नही देखा था, साक्षरता केंद्र में जाकर पढ़ाई की और स्नातक किया ।’’ वो खुश होकर बताती हैं, “कभी मेरा मजाक बनाने वाले लोग तब चुप हो गये जब मैंने दिल्ली के एक कॉल सेंटर में जाकर कई महीने नौकरी की । मेरी तरह मेरे आसपास की कई महिलाओं ने पढ़ाई की थी आज वो घर से जाते वक़्त दूरी पढ़ पाती हैं, घर का लेनदेन रख पाती है और अपनी बेटियों को भी अब पढ़ा रही हैं ।’’ शकीला की तरह हजारों महिलाओं ने पढ़ लिखकर वो कर दिखाया है जो 1988 में शुरू हुई भारत सरकार की प्रौढ़ शिक्षा की योजना भी पूरा नहीं कर पाई ।

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