सीतापुर के किसानों ने शुरू की ‘फावड़ा कृषि पद्धति’ 

सीतापुर के किसानों ने शुरू की ‘फावड़ा कृषि पद्धति’ फावड़ा कृषि पद्धति में किसान फावड़े की उपयोगिता को कायम रखते हुए खेती में इसका उपयोग कर रहे हें।

सुधा पाल, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। सीतापुर जिले के किसान खेतों में अपने आप उगने वाले खरपतवार की उपयोगिता को समझ चुके हैं इसलिए उन्हें खेतों से बाहर फेंकने के बजाय उसे हरी खाद की तरह अपने खेतों में डालने लगे हैं। फावड़ा कृषि पद्धति में किसान फावड़े की उपयोगिता को कायम रखते हुए खेती में इसका उपयोग कर रहे हें।

खेती किसानी से जुड़ी सभी बड़ी खबरों के लिए यहां क्लिक करके इंस्टॉल करें गाँव कनेक्शन एप

जिला मुख्यालय से 60 किमी दूर रेवसा ब्लॉक स्थित सिकोहा गाँव के रहने वाले किसान श्वेतांक त्रिपाठी (33वर्ष) बताते हैं, “सभी किसान ये समझते हैं कि उनके खेतों में उगने वाले तरह तरह के खरपतवारों से उनकी फसल को नुकसान हो सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है।”

खरपतवार को खतों में हरी खाद के तौर पर उपयोग में लाया जा सकता है। इनमें सभी तरह के पोषक तत्व पहले से ही प्राकृतिक तौर पर मौजूद रहते हैं जो मिट्टी की उर्वरक क्षमता को बढ़ाते हैं।
श्वेतांक त्रिपाठी , किसान

ये खरपतवार किसी भी तरह से खेत को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। “हमारे गाँव में 2014 में रहमानखेड़ा से कृषि विभाग के डॉ पंकज त्रिपाठी आए थे। उन्होंने ही हमें इसके बारे में जानकारी दी। इसके साथ ही खेती की कई और विशेष जानकारी गाँववालों को बताई कि किस तरह से सही तकनीक और जैविक खेती से अच्छा और बेहतर उत्पादन किया जा सकता है।”उन्होंने बताया कि इस तकनीक में किसी भी तरह की निराई गुड़ाई की जरूरत नहीं होती है।

जिले के चार ब्लॉक के किसानों ने अपनाई यह तकनीक

श्वेतांक त्रिपाठी ने बताया कि जिले के चार ब्लॉकों में इस तकनीकी का उपयोग किया जा रहा है। इन ब्लॉक में रेवसा, सकरन, बेहटा, रामपुरमथुरा शामिल हैं। लगभग 200 किसानों ने खरपतवार की उपयोगिता समझी और उसका सही उपयोग कर रहें हैं। खेतों के खरपतवार को कूड़ा समझकर लोग इसे निकलवाने के लिए मजदूर तक का इस्तेमाल करते हैं जिसमें अलग से उन्हें खर्च उठाना पड़ता है। इस बेकार के खर्च से भी इस तकनीक से बचा जा सकता है। जिले के किसान बाकी के किसानों को भी इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं और जानकारी दे रहे हैं।सी भी तरह की निराई गुड़ाई की जरूरत नहीं होती है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top