स्मार्ट कार्ड है लेकिन नहीं हो रहा इलाज

स्मार्ट कार्ड है लेकिन नहीं हो रहा इलाजकन्नौज में स्मार्टकार्ड को दिखाते पीड़ित।

कम्यूनिटी जर्नलिस्ट, विवेक राजपूत

लखनऊ। गाँवों के गरीबों और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को बेहतर इलाज के लिए लागू की गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना उत्तर प्रदेश में दो वर्षों से ठप पड़ी है। स्मार्ट कार्ड होने के बावजूद गरीबों को इलाज के लिए सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में फीस भरनी पड़ रही है।

गरीब बीपीएल कार्ड धारक और निजी क्षेत्र के लाखों कर्मचारियों और कामगारों को सालाना 30 हजार रुपए तक के इलाज की आसान सुविधा मुहैया कराने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना लागू की थी। योजना के ठप होने से राजधानी में करीब एक लाख पाँच हज़ार राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का लाभ पाने वाली गरीब सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए धक्के खा रहे हैं।

कन्नौज में हसरेन क्षेत्र के भजुरिया गाँव की रहने वाली उर्मिला ने बताया, “दमा का इलाज कराने जब मैं प्राइवेट हॉस्पिटल पहुंची तो वहां बताया गया कि इस कार्ड से तुम्हारा इलाज नहीं हो पाएगा, फीस देनी पड़ेगी। फिर मैं लखनऊ मेडिकल कॉलेज आईं फिर भी मेरा इलाज स्मार्टकार्ड द्वारा नहीं हो पाया। मुझे फीस और दवा अपने पैसे से लानी पड़ी।” लखनऊ के खदरा की रहने वाली नसीमन ने बताया, “मेरे पति बाम्बे में रहते हैं।

अभी कुछ दिनों पहले मेरी तबियत अचानक खराब हो गयी। दो दिन तक प्राइवेट और सरकारी अस्पताल में मैं भटकती रही लेकिन स्मार्टकार्ड होने के बाद भी इलाज नहीं हो सका।” स्मार्ट कार्ड बना रही निजी कम्पनी और निजी अस्पतालों की इस योजना मे बहुत अहम भूमिका थी लेकिन इन अस्पतालों और निजी कम्पनी को समय से पैसा न मिल पाने के कारण इन लोगों ने जनता को नि:शुल्क इलाज देने में हाथ खड़े कर दिए। नतीजन दो साल से प्रदेश में योजना ठप पड़ी है।

करीब दो साल से यह योजना बन्द पड़ी है। जल्द ही इसको दोबारा लागू किया जाएगा। स्मार्ट कार्ड बनाने के लिए एक निजी कम्पनी का चयन किया गया है।
डीके बाजपेयी, सहायक मुख्य चिकित्सा अधिकारी, लखनऊ

नर्सिंग होम एसोसिएशन की अध्यक्ष डाक्टर रमा श्रीवास्तव का कहना है, “जब यह योजना प्राइवेट अस्पतालों मे लागू की गयी तो ये था कि प्राइवेट अस्पतालों को सारा पैसा सरकार देगी। इलाज के लिए जब मरीज हमारे पास आता तो हम उसको इलाज देते, उसके बाद हम पैसों के लिए बीमा कम्पनी को कलैम करते लेकिन प्राइवेट अस्पतालो को इसका पैसा नहीं मिलता। बहुत सारा पैसा हमारा सरकार के ऊपर बाकी हो गया और उसके बाद सरकार ने यह योजना ही बन्द कर दी।”

कन्नौज दबहा गाँव निवासी अमर सिंह ने बताया, “गाँव में पाँच छह साल पहले एक कार्ड बन रहा था तो हमने भी बनवा लिया लेकिन यह क्यों बना, इसके बनने से हमें क्या लाभ मिलेगा, इस बारे में हमें कुछ जानकारी नहीं है। इसके बनने के बाद परिवार में बहुत बार लोग बीमार हुए, कभी पैसा होता तो कभी नहीं होता लेकिन इलाज तो कराना ही था। कई बार हमने घर में गेहूं बेचकर इलाज कराया है।”

अधिकारी नहीं बता रहे योजना बंद होने का कारण

सीएमओ जीएस बाजपेई से जब पूछा गया कि इस योजना को क्यों बन्द कर दिया गया तो इसका जवाब सीएमओ ने देने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि इसका जवाब देना मतलब आचार संहिता का उल्लंघन होगा। उन्होंने कहा कि योजना को फिर से शुरू किया जाएगा। इस बार गाँव-गाँव जाकर स्मार्ट कार्ड बनाए जाएंगे। जैसे आधार कार्ड बनते हैं उसी तरह निजी कम्पनी गाँव-गाँव जाकर लोगों को कार्ड मुहैया कराया जाएगा।

इस तरह मिलता है लाभ

राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का लाभ पाने के लिए व्यक्ति को 30 रुपए जमा करने होते हैं जरूरी दस्तावेजों के साथ आवेदन करने के बाद संबंधित व्यक्ति के परिवार का स्वास्थ्य बीमा हो जाता है। कुछ दिन बाद संबंधित व्यक्ति को 30 हजार रुपए का डेबिट स्मार्ट कार्ड उपलब्ध कराया जाता है। इससे वह सालभर में 30 हजार रुपए तक का इलाज प्रदेश के किसी भी सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में करा सकता है।

इनको मिलता है लाभ

इस योजना के तहत पंजीकृत मजदूर संगठन जैसे टैक्सी यूनियन, हाथ ठेला यूनियन, टिफिन कार्यकर्ता यूनियन, कुशल-अकुशल मजदूर यूनियन, मनरेगा में काम करने वाले मजदूर, बड़े उद्योगों में काम करने वाले मजदूर, घरों में झाड़ू-पोछा करने वाली महिलाएं, बड़े घरानों में आया की भूमिका अदा करने वाली महिलाएं, खदानों में काम करने वाले मजदूर, रिक्शा चालक, पल्लेदार एवं माल वाहक सहित अन्य मजदूरों को।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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