समय के साथ-साथ अपने अस्तित्व को खोती जा रही सूरजमुखी की खेती

समय के साथ-साथ अपने अस्तित्व को खोती जा रही सूरजमुखी की खेतीइत्रनगरी में सूरजमुखी की खेती अस्तित्व बचाने को जूझ रही है।

अजय मिश्र/रविन्द्र यादव, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

कन्नौज/सकरावा। इत्रनगरी में सूरजमुखी की खेती अस्तित्व बचाने को जूझ रही है। बीते छह वर्षों में रकबा घटकर 10 फीसदी के करीब रह गया है। कृषि विभाग किसानों को बीज उपलब्ध नहीं कराता है। अधिकतर निजी दुकानों पर भी सूरजमुखी के बीजों का टोटा है। मजबूरन किसान मक्का की ओर रुख कर रहे हैं।

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उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिला मुख्यालय से करीब 76 किमी दूर बसे सौरिख ब्लॉक क्षेत्र के नगला खेमकरन निवासी किसान नाहर सिंह (62 वर्ष) कहते हैं, ‘‘ऐसा नहीं है कि सूरजमुखी की खेती में फायदा न होता हो। बीज ही नहीं मिलता है। राष्ट्रीय कृषि बीज भंडार पर भी बीज नहीं दिया जाता है। वह करीब नौ साल पहले खेती करते थे। तीन-चार बार ही पानी लगाने में फसल तैयार हो जाती थी।”

वह आगे कहते हैं, ‘‘प्रति बीघा 1.25 किलो बीज लगता है। एक एकड़ में करीब 3500 रुपए खर्च होता था। सूरजमुखी की फसल 1200-1500 रुपए कुंतल बिक्री होती थी। एक एकड़ यानी पांच बीघे जमीन में 10-15 कुंतल पैदावार होती थी। नाहर सिंह बताते हैं कि जिले में सूरजमुखी बिक्री के लिए मंडी का अभाव है। अत्यधिक भाड़ा खर्च होने और बीज न मिलने की वजह से उन्होंने खेती बंद कर दी।

नगला खेमकरन के ही किसान विश्वनाथ सिंह का कहना है, ‘‘जब मैं खेती करता था तो गंगापार से बीज लाता था। अब वहां भी नहीं मिलता है। एक एकड़ में करीब चार हजार रुपए फसल करने में खर्च करने पड़ते थे। मुनाफा भी ठीक रहता था। आवारा पशु भी नुकसान नहीं करते थे।” हसनपुर गाँव निवासी किसान गिरीश चंद्र (36 वर्ष) का कहना है, ‘‘मेरे पिताजी सूरजमुखी की फसल खूब करते थे। छह-सात साल से सूरजमुखी की फसल बंद कर दी है। इसका कारण बीज न मिलना और फसल बिक्री के लिए मंडी का अभाव है। इस फसल के बदले वह मक्का की फसल करने लगे।”

कृषि विभाग से किसानों को सूरजमुखी का बीज नहीं मिलता है। दुकानों पर बीज उपलब्ध है। सूरजमुखी की खेती पर रोक नहीं लगाई गई है। मक्का की अपेक्षा कम पानी में यह फसल होती है।
नीरज राना,जिला कृषि अधिकारी, कन्नौज

पिछले साल करीब 300 हेक्टेयर जमीन में सूरजमुखी बोई गई थी। इस बार देखो किसान कितनी फसल करते हैं। पांच साल पीछे करीब 25 हजार हेक्टेयर रकबे में सूरजमुखी होती थी। अब किसानों ने मक्का की फसल करना शुरू कर दिया है। इसका कारण मुनाफा अधिक मिलना बताया जा रहा है। तीन पानी में सूरजमुखी की फसल हो जाती है, लेकिन मक्का में आठ से अधिक पानी लगता हैं। सूरजमुखी की 15 फरवरी से 10 मार्च तक बुवाई की जाती है।डॉ. राजेश कुमार, डिप्टी डायरेक्टर कृषि, कन्नौज

सूरजमुखी बीज की मांग नहीं है। उन्होंने मंगवाया नहीं है। पैदावार भी उतनी नहीं है। कुछ वैक्टीरियल दिक्कतें भी बीज और फसल में होती हैं।
राजा सिंह, कृषि बीज सप्लायर तिर्वा, कन्नौज

कंपनियों से सूरजमुखी का बीज नहीं आ रहा है। अब डिमांड भी नहीं है। होली के बाद बुवाई चलती है। अगर डिमांड होगी तो प्रयास किया जाएगा। फिलहाल उनके यहां बीज नहीं है। इसके बदले में मक्का ने कवर कर लिया है।अरुण कुमार,फुटकर कृषि बीज विक्रेता तिर्वा, कन्नौज

किसान शुरू में सूरजमुखी लगातार बो रहे थे। पैदावार भी कम हुई। अब सूरजमुखी का बीज नहीं मिलता है। बाजार की भी समस्या है। इस फसल के बदले मक्के का ऑप्शन किसानों को मिल गया है। हाईब्रिड बीज एक साल बाद खराब हो जाता है।डॉ. वीके कनौजिया, कृषि वैज्ञानिक कन्नौज

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