गाँव की महिलाओं को हस्तशिल्प कला सिखाकर बना रहीं आत्मनिर्भर 

गाँव की महिलाओं को हस्तशिल्प कला सिखाकर बना रहीं आत्मनिर्भर जीवनी, थारु महिला।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

श्रावस्ती। नेपाल सीमा से सटे थारू बाहुल्य रानियापुर गाँव की महिलाएं या तो मछली पकड़ती हैं या फिर खेती कर अपना घर चलाती हैं, लेकिन इसी गाँव की जीवनी (45 वर्ष) हस्तशिल्प में नाम कमा रहीं हैं और गाँव की अन्य महिलाओं को भी हस्तशिल्प कारीगरी सीखाकर आत्मनिर्भर बना रही हैं।

श्रावस्ती जिला मुख्यालय से लगभग 35 किमी दूर सिरसिया ब्लॉक के रानियापुर गाँव की जीवनी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं, उनकी बनाई तरह-तरह की कालीन और चादरें लखनऊ महोत्सव तक में बिकती हैं। दूसरे थारू महिलाओं की तरह दो वक्त की रोटी के लिए जूझते हुए जीवनी ने थोड़ा सा हुनर सीखा। देखते-देखते एक कारीगर महिला उद्यमी में बदल गई और अब दूसरी थारू महिलाओं को अपने साथ जोड़ कर उनकी भी जिंदगी बदल रहीं हैं। जीवनी ने हस्तशिल्प के क्षेत्र में कई और नए प्रयोग किए हैं।

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मेरे साथ गाँव के कई और लोगों ने भी ट्रेनिंग ली थी, लेकिन अब कोई नहीं बनाता, भेड़ के ऊन से मैं ये सब बनाती हूं, गाँव की लड़कियों को भी मैं बुनना सिखाती हूं।
जीवनी, रानियापुर गाँव

जीवनी के बेटे घनश्याम राणा (18 वर्ष) की शादी कम उम्र में गाँव की सोनी राणा (17 वर्ष) से हो गयी थी। जब बहू आयी तो वो पढ़ना चाहती थी। जीवनी बताती हैं, “जब बहू आयी तो पढ़ रही थी, हमारे यहां लड़के-लड़कियां ज्यादा पढ़ते नहीं, लेकिन बहू पढ़ना चाहती थी, मैं उसको पढ़ा रही हूं। अब वह फैज़ाबाद में रहकर बीटीसी कर रही है। अपनी बेटियों को नहीं पढ़ा पाई लेकिन इसे पढ़ाऊंगी, बहू की डेढ़ साल की बेटी मेरे साथ ही रहती है।” वो कहती हैं, “गाँव में लोग कहते हैं जब अपने घर में नहीं पढ़ी तो यहां क्यों पढ़ा रही हो, लेकिन हम किसी की बात नहीं सुनते।”

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