अब गाँव के बच्चे भी नहीं खेलते हैं पारंपरिक खेल

Divendra SinghDivendra Singh   11 Jan 2017 6:12 PM GMT

अब गाँव के बच्चे भी नहीं खेलते हैं पारंपरिक खेलगाँवों में अपने अलग ही खेल हुआ करते थे, जिनसे अब गाँवों की नयी पीढ़ी दूर हो रही है। फोटो:विनय गुप्ता

लखनऊ। गाँवों में अपने अलग ही खेल हुआ करते थे, वहां पर सीमित संसाधनों में भी मनोरंजन हो जाता है, कई ऐसे खेल हैं, जिनसे अब गाँवों की नयी पीढ़ी दूर हो रही है।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. जगदीश नारायण सिंह बताते हैं, “समय के साथ गाँवों में भी बच्चे भी इन खेलों से दूर हो रहे हैं, अब गाँव में बच्चे मोबाइल फोन, टीवी के आ जाने से बच्चे ये खेल नहीं खेलते हैं। आने वाली पीढ़ी को तो इन खेलों के बारे में पता भी नहीं होगा।”

आइए बात करते हैं, ऐसे ही कुछ खेलों के बारे में जिन्हें बच्चे पहले खूब खेलते थे अब उनसे पूरी तरह दूर हो गए हैं।

सतोलिया (गिट्टी फोड़)

सतोलिया पत्थरों का खेल होता है। सात चपटे पत्थर जिन्हें एक के ऊपर एक जमाया जाता है। नीचे सबसे बड़ा पत्थर और फिर ऊपर की तरफ छोटे होते पत्थर। दो टीमें होती हैं और एक गेंद, इसे घर के बाहर मैदान में खेला जाता है। एक टीम का खिलाडी गेंद से पत्थरों को गिराता है और फिर उसकी टीम के सदस्यों को उसे फिर से जमाना पड़ता है और बोलना पड़ता है सतोलिया। इस बीच दूसरी टीम के ख़िलाड़ी गेंद को पीछे से मारते हैं। यदि वह गेंद सतोलिया बोलने से पहले लग गयी तो टीम बाहर। कितने भी लोग इसे खेल सकते हैं पर दोनों टीमों में बराबर खिलाड़ी होने चाहिए।

लंगड़ी टांग

गाँव की लड़कियां इस खेल को खेलती हैं। इस खेल में चाक या खड़िया या फिर ईंट के टुकड़े से कई खाने बनाए जाते हैं दो लड़कियां इसे एक चपटे पत्थर के टुकड़े से खेलती हैं। पत्थर को एक टांग पर खड़े रहकर बिना लाइन को छुए हुए सरकाना पड़ता है। आखिर में एक टांग पर खड़े रहकर इसे एक हाथ से बिना लाइन को छुए उठाना पड़ता है।

गुटके (गिट‍्टी)

इसे लड़कियां गोल-गोल छोटे-छोटे पत्थरों से खेलती हैं। दायें हाथ से गुटका उछाला जाता है और बायें हाथ को घर या कुत्ते के आकर में रखकर उनके नीचे से गुटके निकले जाते हैं। फिर सबको एक साथ एक हाथ से एक गुटका ऊपर उछालते हुए उठाना होता है।

कबड‍्डी

कबड्डी भारत का एक पुराना खेल है, जिसमें दो टीमें होती हैं। इस खेल को दक्षिण में चेडुगुडु और पूरब में हुतूतू के नाम से भी जानते हैं। यह खुले मैदान में खेला जाता है। दो टीमों के बीच एक लाइन होती है। इस दौरान विपक्षी टीम के खिलाड़ी अपने पाले में आए रेडर को पकड़कर वापस जाने से रोकते हैं और अगर वह इस प्रयास में सफल होते हैं तो उनकी टीम को इसके बदले एक अंक मिलता है और अगर रीडर किसी स्टॉपर को छूकर सफलतापूर्वक अपने पाले में चला जाता है तो उसकी टीम के एक अंक मिल जाता और जिस स्टॉपर को उसने छुआ है उसे कोर्ट से बाहर जाना पड़ता है। भारत के गाँवों में खेले जाने वाले इस खेल को अब प्रोफेशनल रूप मिल गया है। प्रो-कबड्डी लीग के जरिए इस खेल को प्रमोट किया जा रहा है, जिसमें कई टीमें कबड्डी खेलती हैं।

कंचे का खेल

यह अक्सर लड़कों द्वारा खेला जाता है। एक गड्ढा बनाया जाता है और उसमें कुछ दूरी से जहां एक रेखा खिंची होती है कंचे फेंके जाते हैं, जिसके कंचे सबसे ज्यादा गिनती में गड्ढे में जाते हैं वह जीतता है। कुछ यूं समझ लीजिये कि यह शहर में खेले जाने वाले बिलीअर्ड की तरह ही है।

रस्सी कूदना

वैसे तो सभी को पता है कि रस्सी वजन घटाने के लिए एक अच्छा व्यायाम है पर गाँव में इसे दूसरे तरीके से खेल की तरह खेला जाता है। वहां मज़े लेकर इसे खेला जाता है। दो लड़कियां एक रस्सी को दोनों सिरों से पकड़ लेती हैं और उसे घुमाना शुरू करती हैं। तीसरी लड़की बीच में कूदती है। सबकी बारी आती है, जो सबसे ज्यादा बिना रुके कूदती है वह जीतती है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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