किसानों के लिए मुसीबत बनी सूखी नहर

किसानों के लिए मुसीबत बनी सूखी नहरबाराबंकी में सूखी पड़ी नजर।

अरुण मिश्रा

स्वयं कम्युनिटी जर्नलिस्ट

विशुनपुर (बाराबंकी)। इस वक्त फसलों को सिंचाई की आवश्यकता है, लेकिन नहरों में पानी न आने से किसानों को मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। किसानों को इंजन और बोरवेल से सिंचाई की व्यवस्था करनी पड़ती है, जो उन्हें काफी महंगी पड़ रही है।

बाराबंकी जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित सिसवारा सफीपुर माइनर लगभग 15 किमी लम्बी है। सिसवारा माइनर देवा नहर से निकलकर बच्छराजमऊ के पास कल्याणी नदी में गिरती है। इस नहर से सरैय्या, दाउदपुर, रामपुर, मोहनपुर, सिसवारा, मवैय्या, सफीपुर, बच्छराजमऊ, लोसरी सहित दो दर्जन गाँवों के किसान सिंचाई करते हैं। इस माइनर की कुछ दिन पहले जेसीबी से खोदाई भी करवाई गई थी फिर भी इस नहर में पानी नहीं आ रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि नहर की खोदाई मानक के अनुरूप नहीं की गई, जिससे नहर में पानी नहीं पहुंच रहा है, लेकिन इस माइनर में पानी न आने के कारण किसान सिंचाई के लिए पानी को तरस रहे हैं।

सिसवारा निवासी रामकेत मिश्रा (50 वर्ष) ने बताया, “हेड के पास नहर ऊंची है। जिसके चलते पानी कुछ गाँवों को छोड़कर आगे थोड़ी मात्रा में ही आ पाता है। जिससे दर्जनों गाँवों के किसान नहर होते हुए भी सिंचाई नहीं कर पा रहे हैं।” इसी गाँव के किसान इमरान अहमद (48 वर्ष) बताते हैं, “खेतों में सिंचाई के वक्त नहर में पानी न आने के कारण दूसरे किसानों से जिनके पास ट्यूबवेल होता है उनसे घंटे के हिसाब से अपने खेतों में पानी पैसे देकर लगवाते हैं जो काफी महंगा पड़ता है।”

इसी गाँव के किसान राकेश मिश्रा (52 वर्ष) ने बताया, “सिंचाई की जब आवश्यकता होती है तब नहर में थोड़ा बहुत पानी आता है, तो पड़ोसी गाँव वाले पानी को आगे नहीं आने देते क्योंकि आने वाला पानी उनके लिए ही पर्याप्त नहीं होता है। जब पानी की मांग कम हो जाती है, तब पानी गाँव तक आ जाता है। कभी-कभी इतना पानी आ जाता है कि नहर कट जाती है और फसलों में पानी भर जाता है।” मोहनपुर निवासी अंकित चतुर्वेदी बताते हैं, “नहर की पर्याप्त खोदाई न होने से हर फसल में पानी की किल्लत रहती है। इस बार भी सफाई के नाम पर खानापूर्ति कर दी गयी, जिससे टेल तक पानी नहीं पहुंच पाता साथ ही बीच के गाँवों के किसानों को भी पानी के लिए काफी दिक्कतें उठानी पड़ती हैं।”

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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