ग्रामीणों ने दो हजार कछुए बचाकर गंगा नदी में छोड़े

ग्रामीणों ने दो हजार कछुए बचाकर गंगा नदी में छोड़ेगंगा नदी में कछुए छोड़ते ग्रामीण।

बसंत कुमार, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

मेरठ। बाढ़ लौटने के बाद गंगा नदी के किनारे किसान जब खेती करने जाते थे तो खेत की जोताई के दौरान उन्हें कछुओं के अंडे मिलते थे, जिन्हें वो फेंक दिया करते थे। लेकिन मेरठ वन विभाग और गैर सरकारी संस्था के जागरूक करने के बाद ग्रामीणों ने दो हज़ार से ज्यादा कछुओं के अंडे सुरक्षित किए और उनसे निकले 1506 कछुए गंगा नदी में छोड़े और 500 कछुए जल्दी ही छोड़ने वाले हैं।

गैर सरकारी संस्था ‘विश्व प्रकृति निधि भारत’ के समन्वयक संजीव कुमार यादव बताते हैं, “गंगा में 12 प्रजाति के कछुए पाए जाते हैं, जिसमें से छह विलुप्त होने के कगार पर हैं। गाँव वालों की मदद से अब तक हमारी संस्था दो हज़ार से ज्यादा कछुए गंगा में छोड़ चुकी है। कछुए बचाने में गंगा नदी के किनारे नौ गाँव के किसान हमें मदद कर रहे हैं।

अब हम नौ गाँवों के 148 किसानों को कछुआ बचाने के विधि बता रहे हैं। संजीव कुमार यादव बताते हैं, “बाढ़ के लौटने के बाद नदी के किनारे के नवम्बर के दिनों में जब किसान खेती करने जाते हैं तो खेत की जोताई के दौरान कछुओं के अंडे मिलते थे, तो किसान उसे फेंक देते थे। जब हमें इसी जानकरी हुई तो हमने किसानों से बात किया कि आपको खेत में अगर कछुए का अंडा मिला तो हमें दे दें।” संजीव आगे बताते हैं, “कछुए बचाने की कोशिश हमने 2012 में शुरू की।

इसके लिए किसानों को काफी समझाना पड़ा। किसानों को खेती के दौरान अंडे मिलते तो वो हमें दे देते हैं। हमने हस्तिनापुर में वन विभाग के साथ मिलकर हैचरी बनवाया और वहीं पर कछुए के अंडे को सुरक्षित करना शुरू किया। पांच साल में हमने दो हज़ार से ज्यादा कछुए बचा लिए।”

किशोरपुर के रहने वाले किसान ऋषिपाल बताते हैं, “कछुओं को बचाकर हमें बेहद ख़ुशी होती है। मैं अपने खेत से उन्हें कछुओं के अंडे तो नहीं दे पाया, लेकिन गंगा नदी के किनारे सब्जी की खेती करने वाले जब खेतों में दवा डालते हैं तो हम उन्हें वन विभाग और विश्व प्रकृति निधि भारत संस्था को सूचित करते हैं। दवा डालने से कछुओं के अंडे बर्बाद हो जाते हैं।”

मखदूमपुर गाँव के रहने वाले किसान राजू भीम ने अब तक 40 से ज्यादा कछुओं के अंडे अपने खेत से निकाल कर वन विभाग और विश्व प्रकृति निधि को दिया है। राजू बताते हैं, “हम आप जितना नहीं कर सकते उससे ज्यादा कछुए नदी की सफाई करते हैं।”

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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