“साहब! मेरा भरा पूरा परिवार है लेकिन मैं भीख मांगने को मजबूर हूं”

“साहब! मेरा भरा पूरा परिवार है लेकिन मैं भीख मांगने को मजबूर हूं”परिवार द्वारा उपेक्षा के बाद लखनऊ में हनुमान मंदिर के बाहर बैठीं रमावती शुक्ला।

अश्वनी द्विवेदी (स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क)

लखनऊ। “मैं भिखारिन नहीं हूं, मेरे चार बेटे हैं, बहुएं हैं, पोता-पोती हैं लेकिन मेरे लिए कोई नहीं है, हम यहीं पर पड़े पड़े कुढ़ रहे हैं, कोई कुछ दे देता है तो ले लेते हैं। लेकिन हाथ फैलाने में हिचक महसूस होती है।” ये कहना है लखनऊ के हनुमान मंदिर के बाहर बैठी 71 वर्षीय रमावती का।

मंदिर के सामान्य भिखारियों के स्वभाव के विपरीत इस बुजुर्ग, बीमार महिला जिसके कपड़े पुराने हैं लेकिन गंदे नहीं हैं कुछ भी बंट रहा हो तो ये भिखारियों के साथ लाइन में लगकर उसे लेने से हिचकती है। फिर भी मंदिर में आने वाले सैकड़ों श्रद्धालुओं में से किसी न किसी की नजर कोने में एकांत में बैठी इस गुमसुम सी बुजुर्ग महिला पर पड़ ही जाती है और वो इसे खाने-पीने का सामान, कभी कपड़े कभी कुछ पैसे दे जाते हैं।

ये पीड़ा है उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के जिला मुख्यालय से महज पांच किमी की दूरी पर अलीगंज के व्यस्त इलाके के पुराने हनुमान मंदिर व उसके आस-पास भीख मांगकर अपने बुढ़ापे के दिन काट रही रमावती शुक्ला की, जो अपने बारे में किसी से बात नहीं करना चाहती हैं।

बहू से भिखारी बनने के पीछे की कहानी के बारे में काफी कुरदेने के बाद रामावती ने बताया कि वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के सिधौली ब्लॉक के ग्राम मनवा की निवासी हैं रमावती अपने माता पिता की इकलौती संतान हैं और उनका बचपन भी मध्यम वर्गीय परिवारों की तरह हंसी-खुशी गुजरा। रमावती का विवाह लखनऊ जनपद के अर्जुनगंज निवासी स्व. रामसेवक शुक्ल के साथ हुआ परिवार में पांच बेटे हैं लेकिन बड़े बेटे की मौत के कुछ समय बाद रामसेवक की भी मौत हो गई। ससुराल में कमाई का कोई जरिया न होने के कारण रमावती अपने चारों बेटों और बहुओं को लेकर अपने मायके ग्राम मनवा आ गईं और अपने पिता से विरासत में मिली पांच बीघा जमीन व घर को चारों बेटो में बांट दिया। कुछ समय बाद घर में हो रही कलह और बेटे, बहुओं द्वारा उपेक्षित होने के कारण बीमार रमावती अपना इलाज कराने लखनऊ आईं तो वापस घर नहीं गईं और इधर उधर भटकते हुए जीवन जी रही हैं।

परिवार के लिए आज भी करती हैं प्रार्थना

अपनी इस हालत के बाद भी रमावती अपने बेटों के खिलाफ एक भी शब्द नहीं सुनना चाहतीं और न ही उनका नाम बताना चाहती हैं ताकि समाज में कोई उनके लड़कों को बेइज्जत न करें। उनका पक्ष लेते हुए वो कहती हैं, “मेरे बेटों की कोई गलती नहीं है, वो मजदूरी करके किसी तरह अपना परिवार चला रहे हैं, हमको कहां से कपड़ा और दवाई लाकर देंगे। मैं इसलिए घर नहीं जाती। मेरे बच्चे और उनका परिवार बना रहे। मैं भगवान से रोज यही मांगती हूं।"

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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