रेप के बाद पूरे गाँव की लड़कियों को छोड़नी पड़ी पढ़ाई

रेप के बाद पूरे गाँव की लड़कियों को छोड़नी पड़ी पढ़ाईनाबालिग के साथ हुई घटना के बाद अभिभावकों ने डर कर छात्राओं को घर में बैठाया

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

भोजीपुरा (बरेली)। “हमारे गाँव में कोई पढ़ने नहीं जाता है। अब्बू बोलते हैं कि कुछ हो गया तो कौन कोर्ट कचहरी करेगा। घर में ही रहो। मैं स्कूल जाकर पढ़ाई करना चाहती हूं।” कक्षा पांच तक पढ़ चुकी घंघोरी गाँव सलमा (14 वर्ष) बताती है।

छह साल पहले घंघोरी गाँव में स्कूल जा रही एक 14 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार की घटना हुई, जिसके बाद से गाँव की सैकड़ों लड़कियों की पढ़ाई बंद करवा दी गई। यह गाँव जिला मुख्यालय से पश्चिम दिशा में लगभग 20 किमी दूर पर है। लड़कियों के स्कूल न जाने का एक कारण जहां स्कूलों में शौचालय का न होना था। वहीं दूसरी ओर लगातार बढ़ रहे महिला अपराधों के कारण अभिभावकों में जग रही असुरक्षा की भावना भी उनके स्कूल जाने में बड़ी बाधा बनती दिख रही है।

इस बलात्कार की घटना के बाद घंघोरी गाँव ही नहीं बल्कि उसके आस-पास के गाँव में लड़कियां स्कूल जाने की बजाय घर पर रह कर अपनी माँ की घरेलू कामों में मदद करती है।

घंघोरी से पांच किलोमीटर दूर दभौरा खंजपुर गाँव की फिजा बानो (15 वर्ष) बताती हैं, “घर में बोलते हैं पढ़कर-लिखकर क्या करोगी। घर में रहकर खाना बनाना सीखो। शादी के बाद दूसरे के घर जाना है यही सब काम आएगा पढ़ाई-लिखाई नहीं।”

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले चार वर्षों से 2015 तक महिलाओं के खिलाफ अपराध में 34 फीसदी की वृद्वि हुई है। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2014 में जहां 3,467 रेप के मामले दर्ज किए गए थे, वहीं वर्ष 2015 में इस तरह के 9075 मामले दर्ज हुए हैं।

लड़कियां चाहे समूह में जाए या अकेले उनके साथ छेड़खानी होती है। ऐसे में अभिभावकों को सोच बदलने की जरूरत है। लड़कियों को उनकी पढ़ाई छुड़वाकर घर नहीं बैठा लेना चाहिए। अभिभावकों को कानून का सहारा लेकर उनकी मदद करनी चाहिए ताकि बदलाव आ सके। अगर लड़कियां छेड़खानी की बात घर पर बता रही है तो परिवारों वालों को उनको सपोर्ट कर चाहिए।
सुतापा सान्याल, एडीजी, उत्तर प्रदेश महिला सम्मान प्रकोष्ठ

दभौरा खंजपुर गाँव की रूबी सिंह(13 वर्ष) बताती है, “हमारे गाँव में सुबह लड़कियां पहन के जाती है। वैसी ही डेस पहन के हमको भी स्कूल जाने का मन करता है पर भाई नहीं जाने देता है।” हाल ही में जारी हुई प्रथम फाउंडेशन की रिपोर्ट में स्कूल न जाने वाली लड़कियों के मामले में यूपी पहले स्थान पर पाया गया है। रिपोर्ट से भी यह तथ्य सामने आता है कि प्रदेश में स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों (6 से 14 उम्र के) की संख्या वर्ष 2014 से 2016 के बीच बढ़ी है।

जिन लड़कियों की पढ़ाई बीच में छूट जाती है या उनको पढ़ने नहीं दिया जाता है। ऐसी लड़कियों को बरेली जिले की गैर सरकारी संस्था साकार उनको शिक्षित करने का काम कर रही है। “ग्रामीण क्षेत्रों में लोग ऐसे हादसों से होने के बाद जल्दी डर जाते हैं। वो अपनी इज्जत के लिए लड़कियों को घर से बाहर नहीं भेजते हैं उनके दिमाग में रहता न लड़की बाहर जाएगी और न ही उसके साथ कोई ऐसा हादसा होगा।” ऐसा बताती हैं, साकार संस्था की नीतिका पंत।

नीतिका आगे बताती हैं, हमारी संस्था अभी ऐसे 10 गाँव में काम कर रही है जहां लड़कियों की पढ़ाई अधूरी रह जाती है। वहां हम लड़कियों का समूह बनाकर उनको शिक्षा देते हैं, सशक्त बनाते हैं ताकि वो और लड़कियों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित कर सके। हमारे समूह की ही लड़कियों ने लगभग 20 लड़कियों को स्कूल में एडमिशन कराया है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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