पैदल फ़ौज: आशा-आंगनबाड़ी में भेदभाव क्यों?

पैदल फ़ौज: आशा-आंगनबाड़ी में भेदभाव क्यों?आशा बहू और आंगनबाड़ी कार्यकत्री दोनों ही हेल्थ वर्कर (स्वास्थ्य कार्यकर्ता) हैं इसलिए दोनों को एक समान सुविधाएं मिलनी ज़रूरी है।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। इंटौजा कस्बे में आशा कार्यकत्री सरस्वती वर्मा (30 वर्ष) अपने गाँव में हुए पिछले वजन दिवस पर आंगनबाड़ी कार्यकत्री के साथ ड्यूटी पर थीं। साथ ही उन्होंने गाँव की गर्भवती महिलाओं को भी इकट्ठा किया। पूरे दिन की मेहनत के बावजूद सरस्वती को एक पैसा नहीं मिला क्योंकि वजन दिवस का पूरा पैसा आंगनबाड़ी कार्यकत्री के खाते में चला गया।

लखनऊ जिला मुख्यालय से 30 किमी. उत्तर दिशा में व्रिकमपुर गाँव की आशा कार्यकत्री सरस्वती बताती हैं,’’ हमारे गाँव में अक्टूबर माह में वजन दिवस मनाया गया था। इस दिन हम गाँव की सभी गर्भवती महिलाओं का वजन करवाते हैं और आंगनबाड़ी दीदी के साथ रजिस्टर पूरा करवाते हैं। वजन दिवस आईसीडीएस (समन्वित बाल विकास योजना) कार्यक्रम है, इसलिए इसका पैसा हमें नहीं मिलता है।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार के तहत मनाए जाने वाले आईसीडीएस कार्यक्रमों में वजन दिवस, आयरन की गोली बंटना ,मातृ-शिशु टीकाकरण और मातृत्व सप्ताह मनाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में शामिल आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को उनके खाते में ड्यूटी का पैसा सीधे मिलता है हालांकि इन आयोजनों में आशा बहुओं की भी हिस्सेदारी बराबर की होती है, लेकिन इन्हें कोई मानदेय नहीं मिलता क्योंकि ये महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के तहत पंजीकृत नहीं हैं।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के मुताबिक मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश में कुल 1,40,094 आशा कार्यकत्री हैं।

आशा बहू और आंगनबाड़ी कार्यकत्री दोनो ही हेल्थ वर्कर (स्वास्थ्य कार्यकर्ता) हैं इसलिए दोनों को एक समान सुविधाएं मिलनी ज़रूरी है। अगर आशाओं को भी उनकी सभी ड्यूटी पर एक निश्चित मानदेय मिले तो यह उनके लिए प्रेरणा की बात होगी।
ज्योत्सना यादव, उपजिलाधिकारी, बीकेटी, लखनऊ

साथ ही एक लाख से अधिक आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां हैं। आंगनबाड़ी कार्यकत्री महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत आती हैं वहीं आशा कार्यकत्रियां राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत पंजीकृत सहायिका होती हैं। “आशा बहू और आंगनबाड़ी कार्यकत्री दोनो ही हेल्थ वर्कर (स्वास्थ्य कार्यकर्ता) हैं इसलिए दोनों को एक समान सुविधाएं मिलनी ज़रूरी है। अगर आशाओं को भी उनकी सभी ड्यूटी पर एक निश्चित मानदेय मिले तो यह उनके लिए प्रेरणा की बात होगी।’’ ज्योत्सना यादव, उपजिलाधिकारी बीकेटी (लखनऊ) बताती हैं।

सरस्वती की तरह ही रायबरेली जिले के बरगदहा गाँव की आशा बहू अर्चना देवी (30 वर्ष) को उनके गाँव में सितंबर में हुए मातृत्व सप्ताह में एक पैसा तक नहीं मिला। अर्चना बताती हैं,’’ जब भी मातृत्व सप्ताह मनाया जाता है, ब्लॉक प्रोग्राम अधिकारी हमें आंगनबाड़ी के साथ लगा देते हैं।”

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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