लोकगीत: पति के दूर जाने पर भावुक पत्नी गाती है बिदेसिया

लोकगीत: पति के दूर जाने पर भावुक पत्नी गाती है बिदेसियाभोजपुरी भाषी क्षेत्रों में बिदेसिया नाटक बहुत लोकप्रिय व प्रचलित है।

देवांशु मणि तिवारी, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। गाँव का एक युवक, जो खेतिहर मजदूर है वह काम की तलाश में अपनी नई-नवेली दुल्हन को छोड़कर शहर यानी विदेश चला जाता है। वहां जाकर वह अपने घर की सभी सुध-बुध भूल जाता है। इधर गाँव में उसकी स्त्री उसके वियोग के कारण भावुक हो जाती है। फिर किसी बटोही के ज़रिए वह अपना सन्देश पति के पास भेजती है।

भोजपुरी लोकगीत बिदेसिया में इस पूरी कहानी को दर्शाया जाता है जिसमें पत्नी द्वारा पति को संदेश भेजकर उसे वापस बुलाने का जिक्र बेहद मार्मिक होता है। वह गाती है ‘रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे’।

भोजपुरी लोकगीत है विदेशिया।

इसकी रचना करने वाले प्रख्यात कवि भिखारी ठाकुर ने अपने पसंदीदा नाटकों में से सबसे बड़ा स्थान बिदेसिया नाट्य-गायन को दिया। भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में बिदेसिया नाटक बहुत लोकप्रिय व प्रचलित है। उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग में पंजीकृत कलाकार बंटी वर्मा (35 वर्ष) प्रदेश के मशहूर बिदेसिया लोकगायक हैं।

बिदेसिया की शुरुआत मंगलाचरण से होती है। मंगलाचरण में पति-पत्नी का संवाद प्रस्तुत किया जाता है। इस गीत में हम यह बताते हैं कि कैसे एक पत्नी अपने पति को संदेश एक बटोही के माध्यम से भेजती है, जो उससे दूर है।
बंटी वर्मा, पंजीकृत कलाकार, संस्कृति विभाग (उ. प्र.)

बिदेसिया लोकगीत की कहानी

बिदेसिया गीत में एक महिला अपने से दूर रहने वाले पति को बटोही (राहगीर) के माध्यम से भेजना चाहती है। बटोही कहता है कि वह उसके पति को पहचानेगा कैसे, तो पत्नी अपने पति का हुलिया उसे बताती है। महिला अपने पति की पहचान बताते-बताते भावुक हो जाती है। इस पूरी कहानी को बिदेसिया गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।

बंटी आगे बताते हैं, हमारे गाजीपुर में पहले हर एक शादी समारोह में बिदेसिया ज़रूर गाया जाता था। आज लाउड स्पीकर का ज़माना है, इसलिए लोगों ने इस गीत को सुनना कम कर दिया है। हालांकि पुराने घरानों और बुज़ुर्गों के बीच यह अभी भी लोकप्रिय है।

गायन ही नहीं नाटक भी है माध्यम

बिदेसिया की लोकप्रियता के बारे में संस्कृति विभाग के प्रांतीय अधिकारी डॉ. लवकुश द्विवेदी ने बताया कि बिदेसिया लोकगायन प्रदेश में गाजीपुर, बलिया, देवरिया और गोरखपुर जैसे जिलों में बहुत प्रचलित है। इसका प्रयोग सिर्फ गायन में ही नहीं बल्कि कई नाटकों में भी किया जाता रहा है। डॉ. लवकुश दिवेदी आगे बताते हैं, ‘बिदेसिया लोकगायन की प्रदेश के बाकी हिस्सों में भी बहुत मांग है। इस कला को बड़ा मंच देने के लिए हमने विभाग के पुरबिया रंग कार्यक्रम में इस शैली को शामिल किया है।’

बिदेसिया बिछोह और मिलन की अभिलाषा के गीत हैं, जिनमें लोकनायक, नायिका के मन की आतुरता का सहज चित्रण होता है। बताते हैं कि एकांत में सुनसान रात में बिदेसिया गीतों की तानें सुनने वालों को बैचेन कर देती हैं।

सामाजिक कुरीतियों को भी उजागर किया जाता है

एक जमाने में इस बिदेसिया का इतना अधिक प्रचार व लोकप्रियता थी कि सहस्त्रों की संख्या में ग्रामीण जनता इसके अभिनय को देखने के लिए उपस्थित होती थी। अपनी युवावस्था में भिखारी ठाकुर इन अभिनयों में खुद भाग लेते थे। अब उनके शिष्यों ने अनेक नाटक मण्डलियों की स्थापना की है, जो इस नाटक का अभिनय करती हैं। इस गीत में सामाजिक बुराइयों, विशेषकर ‘बाल विवाह’ और ‘वृद्ध विवाह’ की और जनता का ध्यान उन्हीं की बोली भोजपुरी में आकर्षित किया गया है। इसकी भाषा बड़ी प्रांजल, सरस एवं मधुर है। यही कारण है कि यह लोकगीत जनता को इतना प्रिय है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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