सुरक्षित नहीं है सफ़र

सुरक्षित नहीं है सफ़रgaonconnection

अपने देश में सड़क पर चलना कोई आसान काम नहीं है। कब आपकी जान पर बन आए, इसकी कोई गारंटी नहीं है। मैं सिर्फ सड़क पर हुए मारपीट जैसी घटनाओं का जिक्र नहीं कर रहा। देश में लाड़-प्यार से पाले गए छोकरों ने मर्निंग वॉक से लेकर पैदल चल रहे लोगों का जीना दूभर कर दिया है।

वैसे भी, पिछले एक साल देश में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में काफी इज़ाफा देखा गया है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की जारी की गई ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है साल 2014 के मुकाबले 2015 में सड़क दुर्घटनाओं में 2.5 फीसद और इन दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में 4.6 फीसद का उछाल आया है। जबकि पिछले एक दशक यानी साल 2005 से 2015 के बीच सड़क दुर्घटनाओं में 14.2 फीसद और दुर्घटना से हुई मौत में 53.9 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। अगर संख्या के हिसाब से कहें तो साल 2015 में कुल सड़क दुर्घटनाओं की संख्या 5,01,423 और उससे होने वाली मौतें करीब डेढ़ लाख तक पहुंच गई हैं।

इसका सीधा मतलब यह हुआ कि हर रोज़ देश में 1,374 सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जबकि रोज़ाना 400 लोग काल के गाल में समा जाते हैं। यह मौतें देश में किसी भी महामारी या बीमारी से होने वाली मौतों से कई गुना अधिक हैं और शायद इसलिए चिंता की बड़ी वजह है।

इन दुर्घटनाओं से अधिकतर यानी करीब 87 फीसद दुर्घटनाएं सिर्फ 13 राज्यों में हुई हैं, जिनमें तमिलनाडु 13.8 फीसद के साथ पहले स्थान पर है और रोड एक्सीडेंट में मरने वालों की संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश पहले पायदान है। यह दुर्घटनाएं सबसे अधिक बड़े शहरों में होती हैं और खासकर देश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या नेशनल हाईवे पर सबसे अधिक 35 फीसद हैं।

यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि देश में नेशनल हाईवे कुल सड़क के लिहाज से अभी महज 2 फीसद है लेकिन देश के कुल ट्रैफिक का 40 फीसद नेशनल हाईवे पर चलता है। ऐसे में मंत्रालय देश में नेशनल हाईवे की लम्बाई मौजूदा 96 हज़ार किलोमीटर से बढ़ाकर 2 लाख किलोमीटर करने की योजना पर काम कर रहा है।

शायद नेशनल हाईवे की लम्बाई अधिक बढ़े तो उन पर यातायात का बोझ भी कम होगा और मौतें भी कम होंगी लेकिन एक और तथ्य जो बेहद काबिलेगौर है, वह है इन दुर्घटनाओं में सबसे अधिक जिम्मेदार बनाया गया है, ड्राइवर को। यानी जिस गाड़ी की दुर्घटना हुई है उसके ड्राइवर को। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में कुल दुर्घटनाओं में से सत्तर फीसद से अधिक के जिम्मेदार ड्राइवर हैं जो यातायात के नियमों का पालन नहीं करते और अमूमन शराब पीकर गाड़ी चलाया करते हैं।

हालांकि, यह आंकड़ा थोड़ा कम विश्वसनीय लगता है। वह इसलिए क्योंकि मंत्रालय के आंकड़े राज्यों की पुलिस के दर्ज रिकॉर्ड पर आधारित है और इसलिए किसी मामले की लीपापोती राज्यों की पुलिस कैसे करती है, यह सबको मालूम है। दूसरी बात यह कि यातायात के नियमों को लेकर हम भारतीय कितने उदासीन हैं इसके नज़ारे तो देश के छोटे-बड़े शहरों और कस्बों तक में साफ दिख जाते हैं। रेलवे फाटकों पर इंतजार करना हम भारतीयों को बड़ा उबाऊ लगता है और इस जल्दी में कितनों की जान गई है वह एक अलग मसला है।

सड़कों की खराब स्थिति, अंधे मोड़ों पर संकेतको की कमी, और जहां-तहां अपनी सुविधानुसार स्पीड ब्रेकर बना देना दुर्घटना के अन्य बड़े कारक हैं लेकिन, इन सबके साथ बसों और ट्रक ड्राइवरों द्वारा ओवरलोडिंग भी एक समस्या है। ओवरलोडिंग के चलते भी बहुत बड़ी संख्या में दुर्घटनाएं होती हैं।

लंबे समय तक ड्राइविंग करने वाले ट्रक ड्राइवर बीच में झपकी नहीं लेंगे, इसकी कौन गारंटी लेगा? साथ ही, गरमी-सर्दी में लंबी यात्रा करने वाले ड्राइवरों को एसी केबिन क्यों नहीं दिया जाता? मंत्रालय अब ट्रकों के ड्राइवरों वाले केबिन को अनिवार्य रूप से एसी बनाने के नियम पर गौर कर रहा है।

भारत ब्राजीलिया डिक्लेरेशन का हस्ताक्षरी रहा है और इस समझौते के हिसाब से साल 2020 तक भारत को सड़क दुर्घटनाओं में 50 फीसद की कमी लानी होगी लेकिन हर साल जिस तरह दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, यह मंजिल अभी दूर की कौड़ी लगती है। इस मामले में सिर्फ सरकार कुछ नहीं कर सकती। सड़क दुर्घटनाएं कम करने में हम सबको आगे आना होगा। सरकार को बुनियादी ढांचे पर काम करना होगा और हम सबको अपनी मानसिकता बदलने पर।

(लेखक पत्रकार है यह यह लेख उनकी अनुमति से उनके ब्लॉग गुस्ताख से लिया गया है।)

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