सूखे से बुवाई न हो पाए तो क्या करे किसान?

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नई दिल्ली। पांच नदियों का क्षेत्र होने के बावजूद बंदुलेखण्ड सूखे की मार झेल रहा है। अवैध तरीके से बालू निकाले जाने के कारण छोटी नदियां दम तोड़ रही हैं और किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं होने से खेती की स्थिति गंभीर हो गई है। ऐसे में ‘पंचनद परियोजना’ को तत्परता से आगे बढ़ाने की मांग जोर पकड़ने लगी है।

भारतीय किसान यूनियन के शिवनारायण सिंह परिहार ने कहा, ‘‘इस बार बुंदेलखंड में औसत रूप से करीब 30 प्रतिशत फसलों की बुवाई हो पायी है। कुछ ब्लाॅकों में तो 4-5 फीसदी ही बुवाई हो पायी। फसलों की कटाई करीब आने के बीच हाल में ओलावृष्टि के कारण स्थिति बेहद गंभीर हो गई है।’’उन्होंने कहा, “विडंबना यह है कि अगर सूखा पड़ जाए अथवा ओलावृष्टि या बेमौसम बरसात हो तब फसलों के नुकसान की भरपाई का प्रावधान है, लेकिन सूखे के कारण जब किसान फसल बुवाई नहीं कर पाए तब किसान क्या करें? सरकार को इस विषय पर भ्ाी ध्यान देना चाहिए।

कागजों पर योजनाएं हो जाती हैं पूरी

परिहार ने कहा कि इस क्षेत्र में पांच नदियां हैं लेकिन खेतों तक पानी पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं है। इस दिशा में पंचदन परियोजना तत्परता से लागू की जानी चाहिए। बुंदेलखंड विकास समिति के संयोजक आशीष सागर ने कहा, “बुंदेलखंड किसानों की त्रासदी का ऐसा इलाका है जहां पांच नदियों के मिलने के बावजूद प्राकृतिक आपदा की मार से कराहते कृषकों की दु:खद दास्तान फसल बर्बादी के बदलते आकलन की बहस और राहत पैकजों के जुमलों में बिखर जाती हैं। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने किसान की ऋण माफी समेत काफी बड़ा पैकेज दिया, लेकिन किसानों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं रुक रहा है।

सूखे के प्रभाव को कम करने में मिलेगी मदद

सागर के मुताबिक 2001 से अब तक 4,175 किसान बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले हिस्से के सात जिलों में आत्महत्या कर चुके हैं। नवंबर, 2014 में आए सर्वे के मुताबिक 2014 में इन 7 जिलों में 109 किसानों ने आत्महत्या की है। भाजपा सांसद अशोक कुमार दोहारे ने कहा, ‘‘इस क्षेत्र में पांच नदियां मिलती हैं और इसे पंचनद के नाम से जाना जाता है। मैं सरकार से अपील करूंगा कि पंचनद को शुरू किया जाए।’’ जल संसाधन, नदी विकास तथा गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने भी शीतकालीन सत्र के दौरान पंचनद परियोजना को आगे बढ़ाने पर विचार करने का आश्वासन दिया है।

‘देश के अन्नदाता’ की दयनीय स्थिति 

विशेषज्ञों का कहना है कि आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या महज आंकड़े नहीं बल्कि यह त्रासद समय से गुजर रहे किसानों की जिंदगी की भयावह तस्वीर है जो सूखे, बाढ़, ओलावृष्टि की मार एवं कर्ज के जाल में फंसे ‘देश के अन्नदाता’ की दयनीय स्थिति बयां करते हैं। झांसी से लेकर बुंदेलखंड तक का इलाका तालाबों से भरपूर रहा है लेकिन आज यहां पर इन तालाबों के अस्तित्व पर संकट के बादल छा गये हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, एक किलो गेहूं, धान तैयार करने में किसानों को 25 से 30 रुपए लागत आती है, सरकार इसे 13 से 16 रुपए में खरीदती है और फसल बर्बाद होने पर उसे जो मुआवजा मिला है, वह मुश्किल से 3..4 रुपया बैठता है। ऐसे में किसान आत्महत्या क्यों करता है, यह कोई अर्थशास्त्र का बड़ा विषय नहीं है और उसके इस कदम के बाद उसका परिवार दर दर ठोकर खाने को मजबूर होता है।

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