स्वर से ज्यादा भावों का सौंदर्य ठुमरी

स्वर से ज्यादा भावों का सौंदर्य ठुमरीgaoconnection

भारतीय शास्त्रीय संगीत में ठुमरी एक ऐसी विधा है जिसमें राग और स्वर से ज्यादा भावों की प्रधानता है। ख़याल और ठुमरी में एक अंतर यही है कि ख्याल में शब्दों की अपेक्षा राग पर विशेष ध्यान रखना पड़ता है। शास्त्रीय संगीत में शुमार ठुमरी ऐसा छोटा मधुर गीत होता है जिस के गायन में पूरी भावनाएं आनी जरूरी हैं। इस में भाव और शब्द के लिए अलग-अलग राग अलापने पड़ते हैं। इसे किसी भी राग रागिनी में गाया जाए, इस का गायन अन्य रागों के गायन से अलग होता है। इसे केवल रागों की तरह नहीं गाया जा सकता है। 

ठुमरी का जिक्र हो तो ये जानना जरूरी है कि इसकी उत्पत्ति कैसे हुई। इसकी उत्पत्ति में लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह का काफी सहयोग है। कहा जाता है कि उन्नीसवीं सदी के मध्य नवाब वाजिद अली शाह के समय में ठुमरी को अच्छा श्रय मिला और उसकी परवरिश हुई। वो न सिर्फ अच्छे ठुमरी गायक थे बल्कि अख्तर पिया नाम से खुद ठुमरियां लिखते थे। 

प्रयोग के आधार पर नवाब के दरबार में ही ठुमरी के दो प्रकार, ‘गानप्रधान’ और ‘नृत्यप्रधान’ ठुमरियों का विकास हुआ था। महाराज बिन्दादीन ‘नृत्यप्रधान’ ठुमरियों के प्रमुख स्तम्भ थे। नृत्य में बोलबाँट की ठुमरियों का प्रयोग किया जाता था। इन ठुमरियों पर नर्तक या नृत्यांगना द्वारा दो प्रकार से भावाभिव्यक्ति की जाती है।

अधिकतर ठुमरियों में नर्तक या नृत्यांगना खड़े होकर पूरे आंगिक अभिनय के साथ नृत्य कराते हैं, जबकि बैठ कर अभिनयात्मक हावभाव के साथ ठुमरी प्रस्तुत करते हैं। दूसरे प्रकार की ठुमरी को ‘बैठकी की ठुमरी’ कहा जाता है। ऐसी ठुमरियों के प्रदर्शन में पण्डित शम्भू महाराज अद्वितीय थे। नृत्यप्रधान ठुमरियों में अधिकतर राधा-कृष्ण की लीलाओं का चित्रण होता है। इनमे भक्ति और श्रृंगार का भाव प्रबल होता है। 

वहीं लखनऊ की ठुमरी को हर पहलू से सजाने संवारने का श्रेय उस्ताद सादिक अली खां जाता है जिन्होंने ख्याल और बंदिश की ठुमरियों में आकार की तानें, मुरकी, खटका और बोल तानें लगाकर इसे नई पहचान दी। सितार के साथ ठुमरी को गाने की रीत भी लखनऊ की है। वाजिद अली शाह के दरबार के मशहूर सितार वादक गुलाम रजां खां ने सबसे पहले सितार पर ठुमरी बजाई। ठुमरी को अवध के आस-पास की आंचल की बोलियों और लोक धुनों की तरंगों से नागरी रूप में सजा संवार कर राज्याश्रम देने का अवध के राज घरानों को भी कुछ कम नहीं है।

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