खुले में शौच के खिलाफ प्रधान की लड़ाई

हाथरस जिले के रामपुर गाँव के ग्राम प्रधान और परिवार ने मिलकर बदली ग्रामीणों की सोच, अब कोई नहीं जाता है खुले में शौच

(रामपुर) हाथरस। हमारे देश में रेलवे ट्रैक को सबसे अधिक वही लोग गंदा करते हैं, जो इसके आसपास रहते हैं। जबकि सच्चाई ये भी है कि इससे सबसे अधिक परेशान भी यही लोग होते हैं। हाथरस जिले के रामपुर गाँव का भी हाल ऐसा ही था, लेकिन अपने प्रयासों से ग्राम प्रधान प्रधान विनोद कुशवाहा ने अपने गाँव को साफ-सुथरा और खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए नई तरकीब निकाल ही ली।

हाथरस जिले के रामपुर गाँव के ग्राम प्रधान विनोद कुशवाहा अपनी ग्राम पंचायत को इस गंदगी से मुक्ति दिलाना चाहते थे, वर्षों से रेलवे ट्रैक के आसपास की झाड़ियों वाली जमीन को शौचालय की तरह इस्तेमाल कर रहे ग्रामीणों को समझा पाना उनके लिए आसान नहीं था।

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ग्राम प्रधान विनोद कुशवाहा बताते हैं, "हम रेलवे ट्रैक और अपनी ग्राम पंचायत को खुले में शौच से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन रेल की पटरियों के किनारे लगी झाड़ियां सबसे बड़ी बाधा बन रही थी। गाँव के लोग मानते ही नहीं, इन झाड़ियों में ही शौच के लिए जाते हैं। तब मैंने सोचा जब झाड़ियां ही नहीं होंगी तो मजबूरी में शौचालय बनवाएंगे।"

जब ग्राम प्रधान ने गाँव के लोगों को बाहर जाने से रोका तो उन्होंने कहा कि क्या हम तुम्हारे घर में जाएं लैट्रिन करने? दिमाग खराब कर रखा है। पहले शौचालय बनवाइए फिर हम रुकेंगे। गाँव को खुले में शौच मुक्त करने के लिए जरूरी था, लोगों को शौचालय की जरूरत महसूस हो। जो झाड़ियां हटने और निगरानी टोलियों आदि से हो गया था।

अब बारी थी पंचायत में एक साथ शौचालय बनवाने की, इसके लिए शुरूआत में सबसे बड़ी समस्या आई कि जिन लोगों के पास पैसे नहीं थे उनके यहां शौचालय का निर्माण कैसे शुरू कराया जाए? लेकिन कहते हैं कि जब इरादे मजबूत हों तो रास्ते खुद-ब-खुद निकल ही आते हैं। इस समस्या को सुलझाते हुए ग्राम प्रधान विनोद कुशवाहा ने हल निकाल ही लिया। प्रधान ने ईंट, सरिया और सीमेंट के दुकानदारों को हर ग्रामीण से एक सहमति पत्र दिलवाया, जिसमें लिखा था कि अगर सरकार से शौचालय की पहली किश्त आने पर लाभार्थी, दुकानदार पैसा नहीं लौटाएंगा तो मैं पैसे दूंगा। प्रधान के इस सहमति पत्र के बाद सभी दुकानदार राजी हो गए, और गाँव में शौचालय निर्माण का काम जोर-शोर से शुरू हो गया।

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"मैंने कहा कि अगर गाँव वाले पैसा नहीं देंगे, तो हम देंगे। ईंट भट्टे वालों से कहा कि सहमति पत्र दूंगा, आप समान दे देना। बाकी जिम्मेदारी मेरी। पहली बार में 50 शौचालय बने, लोगों ने पैसे आने पर वापस कर दिया। सहमति पत्र में था कि अगर आप शौचालय बनाओगे तो 12 हजार मिलेंगे। पंचायत में एक दिन में 70 गड्ढे खोदे गए। लोगों ने खुद ही गड्ढे खोदे, "ग्राम प्रधान ने आगे कहा।

परिवार का भी मिला पूरा साथ

पंचायत को खुले में शौच मुक्त कराने के लिए ग्राम प्रधान विनोद कुशवाहा के पूरे ने उनका साथ दिया। जहां पत्नी गीता देवी ने महिलाओं को समझाने की जिम्मेदारी संभाली। तो वहीं बेटे इशांत और बेटियां हर्षिता और कीर्ति ने गाँव के अन्य बच्चों के साथ हर सुबह एक टोली में निकल कर गाँव के लोगों को खुले में शौच के खिलाफ जागरुक करते। गीता देवी हर रोज अपने गाँव का पूरा चक्कर लगातीं। अगर कहीं कोई जरूरत महसूस होती तो प्रधान जी से बोलकर उसे पूरा करने के लिए कहती हैं।

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प्रधान की पत्नी गीता देवी कहती हैं, "हमने सोचा अगर हम समझाएंगे तो महिलाएं बोलेंगी प्रधान की बीवी हो गई हैं तो अब बड़ा वो हो गई है, सब पर रौब गांठेगी। जितने हमारे बच्चों के दोस्त हैं या घर आते थे, उनसे कहते कि देखो बेटा आप की मम्मी और बहन बाहर शौच के लिए जाते हैं अच्छा नहीं लगता है, आप उनसे कहा करो कि बाहर शौच न जाया करें। मैं अपने बच्चों से भी कहती कि मेरा बोलना सही नहीं लगेगा, तुम अपने दोस्तों से कहा करो कि वो अपने माँ और बहन को समझाएं।"

थोड़ी आनाकानी और मानमनौव्वल के बाद गाँव के लोगों को अखिर अहसास हो ही गया, स्वच्छता समितियों ने मोर्चा संभाल लिया और घर-घर शौचालय बनने के साथ हीपूरे गांव में साफ-सफाई की एक नई मुहिम चल पड़ी।

क्लोजिंग बाइट : ग्राम प्रधान विनोद कुशवाहा के परिवार के अथक प्रयासों के साथ ही पूरे गाँव की मेहनत का नतीजा है कि रामपुर ग्राम पंचायत आज खुले में शौचमुक्त है। यह नहीं कि अपने इस मिशन को पूरा करने के लिए ग्राम प्रधान विनोद कुशवाहा ने कुछ अलग किया, बल्कि उन्होंने हर काम को अलग ढंग से किया। शुरू में दिक्कतें जरूर आईं, लेकिन आखिर में जीत भी मिली।

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