यहां घर-घर पहुंचती है धान कूटने वाली मशीन

यहां घर-घर पहुंचती है धान कूटने वाली मशीनधान कूटने की मशीन

मोबिन अहमद- कम्युनिटी जर्नलिस्ट

रायबरेली। बछरावां क्षेत्र के साठ वर्षीय जमना काका को अब 10 किमी दूर साइकिल पर बोरी लादकर धान कूटाने नहीं जाना पड़ता हैं, क्योंकि अब धान कूटने वाली मशीन खुद चलकर उनके घर तक आ जाती है।

दरवाजे पर धान कूटने की मशीन आने की सबसे ज़्यादा खुशी पंडिताइन चाची को हुई है, क्योंकि उनके घर में केवल बहू और उनकी बेटी ही है। कन्नावां गाँव की पंडिताइन चाची के नाम से मशहूर मालती मिश्रा (52) बताती हैं, “लड़का परदेस मा है, इसलिए धान कुटाने के लिए दूसरों से चिरौरी (विनती) करनी पड़ती थी। अब तो धान कूटै वाली मशीन दुआरे आ जावत है, बड़ा आराम है अब।''

धान कूटने की मशीन

इस धनकुट्टी मशीन के मालिक प्रदीप शिवगढ़ ब्लॉक के दहिनावां गाँव में रहते हैं। ये पहले ट्रैक्टर से लोगों के खेत जोतने का काम करते थे। एक वर्ष पहले प्रदीप ने मुबारकपुर टांडा, जिला अम्बेडकर नगर के पूर्वांचल कृषि यंत्र उद्योग से यह धनकुट्टी मशीन ढाई लाख रूपए में खरीदी थी, तब से वो घर-घर जाकर धान कूटने का काम करते हैं।

रायबरेली के बछरावां ब्लॉक स्थित विशुनपुर गाँव में धनकुट्टी मशीन चला रहे प्रदीप (25) ने बताते हैं, “ यह मशीन लोगों के एक फोन करने पर उनके घर तक जाकर धान कूटने का काम करती है। बस शर्त इतनी है कि जहां बुलाया जाए, वहां कम से कम चार-पांच लोग धान कूटाने को तैयार हों।"

धान कूटने के लिए प्रदीप कोई पैसा नहीं लेते हैं, बल्कि धान कूटने के बाद निकलने वाली भूसी और किनकी ले लेते हैं। इस तरह गाँव वालों का काम भी सस्ते में निकल जाता है।धान कूटने की मशीन से अमूमन तीस से पैतीस कुंतल धान रोज आसानी से कूटा जा सकता है।

प्रदीप आगे कहते हैं, “पूरे ब्लॉक में जहां से फोन आता है वहां जाकर हम मशीन चला देते हैं। अगर धान की मात्रा पांच से छह कुंतल है तभी हम ज़्यादा दूर के गाँवों में जाते हैं।"

आमदनी की बात करते हुए प्रदीप ने बताया कि धनकुट्टी मशीन में तेल का खर्चा लेबर, लेबर खर्चा निकाल कर सीजन में आराम से एक लाख से सवा लाख रूपए तक कमा लेते हैं।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation www.ipsmf.org).

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