पुराने कपड़ों से किसी की चलती है रोज़ी-रोटी तो किसी का ढकता है तन

पुराने कपड़ों से किसी की चलती है रोज़ी-रोटी तो किसी का ढकता है तनकानपुर नगर की गोस्वामीनगर बस्ती में पुराने कपड़ों की सिलाई करते कीरतलाल

कम्युनिटी जर्नलिस्ट- संगीता श्रीवास्तव

गोस्वामीनगर (कानपुर नगर)। इस बस्ती के 100 परिवार के लोग पीढ़ियों से पुराने कपड़ों की सिलाई करके अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं । पूरी बस्ती की महिलाएं बाजार से खरीदे गये पुराने कपड़ों की धुलाई और प्रेस दिन भर करती हैं, यहाँ के पुरुष दिन भर इन पुराने कपड़ों की सिलाई करते हैं। एक कपड़े में 10 से 15 रुपए मिलते हैं जिससे इनके पूरे परिवार का खर्चा चलता है।

कानपुर नगर के झकरकटी बस अड्डे से आधा किलोमीटर दूर पूरब दिशा में गोस्वामीनगर है। इस बस्ती में रहने वाले कीरतलाल (60 वर्ष) बताते हैं कि सुबह अपने घर के सामने सिलाई करने के लिए बैठ जाते हैं और शाम तक 10 से 15 पुराने कपड़ों की सिलाई कर लेते हैं। जिससे प्रतिदिन 100 से 150 रूपए कमा लेते हैं।

वो आगे बताते हैं कि गाँव-गाँव जाकर बर्तन वाले पुराने कपड़े खरीदते हैं और उसके बदले में बर्तन दे आकर आते हैं। बर्तन वाले पुराने कपड़े हमे सिलाई-धुलाई और प्रेस के लिए देते हैं। पुराने कपड़ों का काम हमारा पूरा परिवार कई वर्षों से कर रहा है इसी से हमारे दैनिक खर्चे चलते हैं।

इस बस्ती में रहने वाले मुकेश कुमार (39 वर्ष) बताते हैं “जमीनी कागजात न होने की वजह से हमे लोन नहीं मिलता है, पैसे के अभाव में हम अपनी निजी सिलाई की दुकान नहीं कर पाते हैं। इसलिए हमारे पूर्वज भी यही काम करते थे। वो आगे बताते हैं हर रविवार लखनऊ की चौक बाजार में इन पुराने कपड़ों को बेचने के लिए जाता हूँ। कपड़े की क्वालिटी के अनुसार एक कपड़ा 50 से 100 रूपए में बिक जाता है। अगर इन कपड़ों को थोक विक्रेताओं को बेचना है तो प्रति कपड़ा 20 रुपए में पड़ता है।

सुबह से शाम तक इस बस्ती में 100 घरों के सामने सभी अपनी-अपनी सिलाई मशीन रोड पर रखकर सिलाई करते हैं, महिलाएं इन कपड़ों की धुलाई और प्रेस करती हैं। यहाँ के लोगों का कहना है कि नये कपड़ों की सिलाई इसलिए नहीं करते क्योंकि हमारे पास खुद की दुकान नहीं है, रोड पर रखकर अगर सिलाई करेंगे तो नये कपड़े गंदे हो जायेंगे जबकि पुराने कपड़ों के साथ कोई समस्या नहीं होती। पुराने कपड़ों को सिलाई के बाद तो वैसे भी धुलना पड़ता है।

मजदूर तबके के लोग जो कपड़ा 50 से 100 रुपए में खरीदते हैं वो कपड़ा कई जगहों से होकर गुजरता है तब उसे नया पहनने जैसा बनाया जाता है । ये पुराने कपड़े हमारे शहर,कस्बों और गाँव की गलियों से आते हैं।

ये वो कपड़े होते हैं जिनकी या तो सिलाई खुली होती है या फिर छोटे होने लगते हैं। लोग इन्ही कपड़ो के बदले बर्तन खरीद लेते हैं। इन कपड़ों का सही ढंग से इस्तेमाल हो इसके लिए इनकी पूरी मरम्मत की जाती है और इन्हें बाजार में बेचा जाता है। इन पुराने कपड़ों से कई लोगों को रोजगार मिलता है साथ ही कई का तन ढकता है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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