एक साल बाद नहर में आया पानी, मगर ग्रामीण नहीं कर सके सिंचाई  

एक साल बाद नहर में आया पानी, मगर ग्रामीण नहीं कर सके सिंचाई  हलोलपुर थाना काशिमपुर तहसील संडीला में नहर तो हैं, लेकिन किसानों को नहीं मिलता पानी।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

कम्यूनिटी जर्नलिस्ट: अनुपम अग्निहोत्री

बहलोलपुर (हरदोई)। हरदोई जिले के बहलोलपुर गाँव के हजारों किसान आस लगाये बैठे हैं कि जैसे ही नहर में पानी आ जाये, वैसे ही वे अपने हजारों बीघा बोई गेहूं की फसल की सिंचाई कर लें। एक साल बाद नहर में पानी आया भी, मगर वे किसान सिंचाई नहीं कर सके।

नहर से लगी हुई ज्यादातर खेती

हरदोई जिले के संडीला ब्लॉक से 21 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में बहलोलपुर गाँव हैं। पांच हजार वोटर वाले इस गाँव में 2400 बीघा खेती है और यहां के किसानों की ज्यादातर खेती नहर से लगी हुई है। पिछले तीन वर्षों में कभी-कभार पानी आ जाता था, लेकिन एक साल से बिल्कुल भी पानी नहीं आया। पूरे एक साल बाद एक सप्ताह पहले नहर में पानी आया भी, मगर उस पानी का किसान लाभ नहीं उठा सके।

सिंचाई में हो जाती है देरी

इस गाँव में रहने वाले छोटी जोत के किसान छोटेलाल (55 वर्ष) कहते हैं कि “नहर सिर्फ नाम की बनी है। नहर में पानी के दर्शन नहीं होते। हर बार सिंचाई से पहले सोचना पड़ता है क्योंकि एक बीघा सिंचाई की लागत कम से कम एक हजार रुपये आता है। छोटेलाल की तरह बहलोलपुर गाँव के हजारों किसान अपनी गेहूं की फसल की समय से सिंचाई नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि नहर में पानी नहीं आता और ट्यूबवेल की सिंचाई बहुत मंहगी पड़ती है। इसलिए पैसे के इंतजाम में बहुत समय लग जाता और सिंचाई में देरी हो जाती है।

किसानों को नहीं मिला पानी

इसी गाँव के किसान भगवान शंकर (50 वर्ष) बताते हैं कि एक सप्ताह पहले नहर में पानी एक साल बाद आया। नहर में पानी आने से हम बहुत खुश थे क्योंकि हमारा पांच बीघा आम का बगीचा सूखा जा रहा था, लेकिन यहाँ के अधिकारियों ने पानी नहीं लगाने दिया। अधिकारियों का कहना था कि “पानी आख़िरी छोर तक पहुंचना हमारा टारगेट है। जब आखिरी छोर तक पानी पहुंच जाए तब कोई भी किसान पानी लगा सकता है।” भगवान शंकर आगे बताते हैं कि पानी आगे तक पहुंचा या नहीं, ये तो हमें नहीं मालूम, लेकिन हमारे लिए नहर का पानी जरूर चला गया।

धान और गेहूं हैं मुख्य फसलें

यहाँ के किसानों की मुख्य फसल धान और गेहूं है और ये दोनों ही फसलें पानी पर निर्भर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि ये नहर बालामऊ के पास कलौली से जाहिदपुर तक जाती है, जिसके बीच की दूरी लगभग 25 किलोमीटर है। कई गाँवों से होकर गुजरने वाली इस नहर के किनारे हजारों बीघा खेती है, अगर इस नहर में पानी आता तो यहाँ की हजारों बीघा खेती इसके पानी से सिंचित होती। इसी गाँव के किसान नंदकिशोर का कहना है “मजबूरी में फसल की बुआई और सिंचाई तो करनी ही पड़ती है पर ट्यूबवेल से लागत बहुत आती है।” नंदकिशोर की तरह यहाँ के हजारों किसान ट्यूबवेल से ही अपनी फसल की सिंचाई करते हैं क्योंकि नहर में पानी आने के बाद भी उन्हें अब कोई आसार नहीं है।

तब तक काट दिया जाता है नहर का पानी

ग्रामीणों का कहना है अगर नहर में साल दो साल में कभी पानी आता भी है तो समय से नहीं आता। ये पानी या तो बरसात में आता है, जब जरूरत नहीं होती या फिर जब ऊपर से अधिकारियों का दबाब होता है। उस समय आये पानी का ये ग्रामीण लाभ नहीं उठा पाते क्योंकि जबतक पानी आख़िरी छोर तक पहुंचता है और इनकी सिंचाई करने का नम्बर आता है, तब तक नहर का पानी काट दिया जाता है। अगर इस नहर में समय से पानी आ जाए तो यहाँ की हजारों बीघा फसल की बोआई और सिंचाई दोनों समय से हो सकती हैं।

एक सप्ताह पहले नहर में पानी छोड़ा गया था और हर सप्ताह पानी छोड़ा जाता है। ग्रामीणों को जिस दिन पानी लगाना होता है, अगर उन्हें उस दिन पानी नहीं मिला तो वो कहने लगते हैं कि साल भर से पानी नहीं दिया गया है, जबकि यहाँ समय से पानी छोड़ दिया जाता है।
जेपी सिंह, अधिशाषी अभियंता, हरदोई

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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