रोक के बावजूद यूपी के कई इलाकों में हो रही है साठा धान की खेती, धरती के पानी की होती है बर्बादी

Diti BajpaiDiti Bajpai   5 March 2017 1:19 PM GMT

रोक के बावजूद यूपी के कई इलाकों में हो रही है साठा धान की खेती, धरती के पानी की होती है बर्बादीआस-पास के गाँव के ही किसान साठा धान लगाते हैं।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। भू-जल के अंधाधुंध दोहन और वर्षा जल संचयन न होने पर कई जिलों में साठा धान की फसल पर रोक लगा दी गयी है, लेकिन फिर भी किसान जल्दी लाभ पाने के लिए साठा धान लगा रहे हैं।

“हमारे आस-पास के गाँव के ही किसान साठा धान लगाते हैं। इसमें बहुत ज्यादा पानी लगता है। ज्यादा सिंचाई से लोगों को बहुत दिक्कत होती है। पानी बहुत नीचे चला गया है। पहले जिस खेत की सिंचाई दो घंटे में हो जाती थी वो अब सात से आठ घंटे में भी नहीं हो पाती है।” ऐसा बताते हैं, कमलेश सिंह (29 वर्ष)।

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जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर बंडा ब्लॉक के बसंतापुर गाँव में रहने वाले किसान कमलेश सिंह धान की खेती करते हैं। कमलेश बताते हैं, “यहां ज्यादातर किसान यही धान लगा रहे हैं, कोई भी अधिकारी यहां देखने नहीं आता है और किसान फिर भी धान लगाता है।” पिछले साल प्रदेश के 821 ब्लॉकों में 111 ब्लॉक में भू-जल स्तर तेजी से गिरा है। इनको डार्क जोन में घोषित किया जा चुका है। वहीं 68 ब्लॉक की स्थिति चिंताजनक है।

साठा धान की क्षेत्र में हो रही कृषि से किसानों को कमाई तो जरूर हो रही है, लेकिन इसकी खेती से लगातार भूगर्भ जल स्तर में गिरावट आ रही है।

साठा धान की बुवाई को रोकने के लिए कोई भी शासनादेश नहीं है। स्थानीय स्तर पर गोष्ठी, मेलों में इसको न लगाने के लिए किसानों को जागरूक किया जाता है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों मे इसे रोकने के लिए अधिनियम बना हुआ है।
डा. प्रभाकर सिंह, उप कृषि निदेशक, शाहजहांपुर

उत्तर प्रदेश के अलावा देश के कुछ अन्य राज्यों पंजाब, हरियाणा आदि के किसानों में पिछले कुछ वर्षों से साठा (चैनी) धान की खेती के प्रति रुचि बढ़ चुकी है। किसान गन्ना की फसल कटाने के बाद खाली खेतों में दलहन की खेती की जगह साठा धान की खेती को प्राथमिकता देने लगे हैं। प्रभाकर आगे बताते हैं, “अगर कोई एक्ट बन जाए तो इसको कम किया जा सकता है। हालांकि हमारे जिले इस बार साठा धान की काफी कम बुवाई हुई है।”

शाहजहांपुर जिले की तरह ही कन्नौज जिले में जल स्तर बहुत कम हो गया है। यहां के जलालाबाद और तालग्राम को डार्क जोन घोषित किया गया है। आलू के बेहतर उत्पादन के लिए मशहूर इस जिले में अधिक मुनाफा कमाने के लिए किसान मक्के की खेती कर रहे हैं। जिले में 50 हजार हेक्टेयर में बे-मौसम इसकी खेती किए जाने के कारण अधिक सिंचाई की जरूरत पड़ रही है, जिसका एकमात्र जरिया भू-जल है। इन फसलों में 10 से 12 बार सिंचाई करनी पड़ती है। कई जिलों का भूगर्भ जलस्तर लगातार गिर रहा था। इसलिए शासन ने गर्मी में पैदा किए जाने वाले धान पर रोक लगा दी है।

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