शिक्षक ने खुद ही बदल दी प्राथमिक विद्यालय की सूरत, बच्चे लगाते हैं टाई, माइक से करते हैं प्रार्थना  

शिक्षक ने खुद ही बदल दी प्राथमिक विद्यालय की सूरत, बच्चे लगाते हैं टाई, माइक से करते हैं प्रार्थना  बाराबंकी के सूरतगंज ब्लॉक के गोंडा गाँव में यह है प्राथमिक विद्यालय।

कम्यूनिटी जर्नलिस्ट: प्रतीक शुक्ला

सूरतगंज (बाराबंकी)। उत्तर प्रदेश में एक लाख 58 हजार 396 बेसिक स्कूल हैं। आए दिन समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहता है कि प्रदेश के इस स्कूल में टीचर नहीं आ रहे हैं, पढ़ा नहीं रहे हैं, कुछ टीचर स्कूल आकर टहल कर चले जाते हैं, लेकिन आज भी कुछ प्राथमिक विद्यालयों में ऐसे भी मेहनती टीचर हैं, जो अपना सब कुछ झोंक कर बच्चों को पढ़ाई वाला माहौल और अच्छी पढ़ाई देते हैं। ऐसे ही बाराबंकी जिले में एक अध्यापक हैं जो अपनी सैलरी से विद्यालय में बच्चों की पढ़ाई में जरूरी वस्तुओं भी दे देते हैँ।

प्रेरक प्रसंग सुनते हैं छात्र

बाराबंकी जिला मुख्यालय से 54 किमी दूर सूरतगंज ब्लॉक के गोंडा गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय है, जहां विद्यालय की शुरुआत प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर प्रातःकालीन सभा का आरंभ माइक से प्रार्थना के साथ होती है। विद्यालय का संचालन समय से करीब आधा घंटे पूर्व ही प्रारंभ हो जाता है। प्रार्थना सभा में छात्रों को माइक के माध्यम से प्रेरक प्रसंग और समसामयिक घटनाओं से अवगत कराया जाता है। तत्पश्चात कक्षाओं में पढ़ाई प्रारंभ होती है।

ड्रेस के साथ टाई-बेल्ट भी

विद्यालय में पेड़-पौधों की गैलरी भी बनायी गयी है। एक ओर जहां परिषदीय विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण ड्रेस भी नहीं प्राप्त हो पाती है, वहीं इस विद्यालय के सहायक अध्यापक आनंद कुमार शुक्ला ने ड्रेस के साथ-साथ टाई बेल्ट बांटकर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। अध्यापक आनंद कुमार बताते हैँ, "हम अपने विद्यालय में बच्चों को पढ़ाई से संबंधित हर तरह की सुविधा देते हैं। हम अपनी तरफ से बच्चों को ड्रेस, टाई, बेल्ट समेत और भी जरूरी सामान बच्चों को अपने पैसे से मुहैया कराते हैं।"

ऐसा नहीं है कि अव्यवस्थाएं नहीं है

आनंद आगे बताते हैं, "शिक्षकों के इन प्रयासों को प्रशासन की तरफ से कोई सहयोग नहीं प्राप्त हो पा रहा है। कई बार शिकायत करने पर भी स्कूल का हैंडपंप रिबोर नहीं कराया गया है।" यहां 148 छात्रों के नामांकन के सापेक्ष मात्र दो शिक्षक तैनात हैं, जबकि आरटीआई मानक के अनुसार पांच शिक्षक होने चाहिए। फिर भी शिक्षकों की कर्मठता के आगे विद्यालय के विकास में आ रही हर बाधा स्वयं ही नतमस्तक हो जा रही है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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