बच्चों के पुष्टाहार से तंदरुस्त हो रहे पशु

बच्चों के पुष्टाहार से तंदरुस्त हो रहे पशुबच्चों का पोषाहार पहले ही पशुओं के लिए बेचा जा चुका है।

अजय सिंह चौहान, स्वयं कम्युनिटी जर्नलिस्ट

लखनऊ। बच्चे आंगनबाड़ी केंद्रों पर इस आस में जाते हैं कि उन्हें सरकार की ओर से पोषाहार मिलेगा, लेकिन बख्शी का तालाब विकासखंड के कठवारा, मदारीपुर, सोनवा सहित 280 केंद्रों पर स्थानीय बच्चों को सिर्फ मायूसी मिल रही है। क्योंकि यहां उनके हिस्से का पोषाहार पहले ही पशुओं के लिए बेचा जा चुका है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र के अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्र खुलते ही नहीं हैं। अगर कहीं खुलता भी है तो बच्चों को पोषाहार नहीं मिलता। ग्रामीणों के मुताबिक कार्यकर्तियां पोषाहार को केंद्रों पर न रखकर अपने घरों पर रखती हैं और वहीं से पशुओं के आहार के लिए इसे खुलेआम बेच रही हैं।

सरकार की पोषाहार योजना भी उन योजनाओं में एक है, जिसे नेक मकसद से लागू किया गया था। लेकिन यह भी तमाम योजनाओं की तरह सरकारी कर्मचारियों की लूट-खसोट और लापरवाही का जरिया बन गई।

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कठवारा गाँव के किसान झरोखा (50 वर्ष) बताते हैं, “ग्राम पंचायत के अंतर्गत सभी आंगनबाड़ी केंद्रों पर आने वाला पोषाहार बच्चों को न देकर कार्यकर्तियां महंगे दामों पर बेंच रही हैं। इसका इस्तेमाल पशुओं के आहार के लिए किया जाता है, जबकि यह पोषाहार बच्चों के लिए सरकार भेजती है।”

कठवारा आंगनबाड़ी केंद्र की एक कार्यकर्तियां ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया, “बच्चे पोषाहार खाना कम पसंद करते हैं और हम लोगों को हर महीने सुपरवाइजर को एक हजार रुपए देने पड़ते हैं। ऐसे में हम लोग मजबूरी में पोषाहार की बिक्री करते हैं।”

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वहीं इसी क्षेत्र के रहने वाले रविकांत बाजपेयी (55 वर्ष) बताते हैं, “ग्राम प्रधान भी इस ओर ध्यान नहीं देते हैं। जनता के हितों का ध्यान रखते हुए सरकार द्वारा चलाई जा रही बाल विकास परियोजना के आला अधिकारी ही इस योजना को धराशायी करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। पोषाहार की बिक्री को बंद कराने के लिए कई बार उच्चाधिकारियों को अवगत भी कराया जा चुका है, लेकिन अभी तक कोई सुधार होता नहीं दिखाई दे रहा है।”

सीडीपीओ तारा यादव ने बताया, आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषाहार की बिक्री की अभी मुझे कोई जानकारी नहीं है। अब जानकारी मिली है। मामले की जांच कर दोषी कार्यकर्तियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

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