बीज बेचकर कमाई करने को मजबूर बच्चे

बीज बेचकर कमाई करने को मजबूर बच्चेबभनी ब्लॉक क्षेत्र के खैराडीह ग्राम चकवड़ की कटाई के बाद बीज निकालते बच्चे।

कम्यूनिटी जर्नलिस्ट: भीम जायसवाल/राकेश गुप्ता

दुद्धी (सोनभद्र)। आधुनिक भारत में जहां हर क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का उपयोग बढ़ता जा रहा है और लोगों की हर जरूरतें तुरंत पूरी हो रही हैं। लेकिन देश का बड़ा तबका आज अपनी बेबसी पर रो रहा है। उनका न तो खाने का ठिकाना है और न ही सोने को घर, वे सिर्फ गरीबी का दंश झेल रहे हैं। मगर इन परिवारों के मासूम बच्चे, जिनके हाथों में कलम की बात तो सरकारें करती हैं, लेकिन उनके परिवार की आर्थिक स्थिति क्या है, इसकी जानकारी नहीं रखते। इसी का उदाहरण है, आदिवासी बाहुल्य जिला सोनभद्र के गरीब परिवार के बच्चे, जो स्कूल तो जाते हैं, लेकिन स्कूल के बाद वो कड़ी मेहनत कर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में जुटे रहते हैं।

चकवड़ की कटाई करते हुए मिले बच्चे

सोनभद्र से लगभग 74 किमी दूर दुद्धी तहसील क्षेत्र के दर्जनों गाँवों में आज भी गरीब परिवार के बच्चे होटलों में या फिर बाल मजदूरी करते देखे जाते हैं। लेकिन समाज का दर्पण इसे हमेशा नजर अंदाज कर देता है और सहभागिता निभाता है। बभनी ब्लॉक क्षेत्र के खैराडीह ग्राम के कक्षा चार में पढ़ने वाले स्कूली बच्चे संतोष, सोहर लाल, रामशकल अपने-अपने परिवार की जरूरतों को पूरी करने के लिए वन क्षेत्र में उगने वाले चकवड़ (वन तुलसी) की कटाई करते हुए पाये गए।

ऐसे कमाई करने को मजबूर

छात्र संतोष बताते हैं, "चकवड़ को काट कर सुखाने पर उनके बीजों को बाजारों में बेच कर हम अपनी कुछ जरूरतों को पूर्ण कर लेते हैं और वर्ष के हर मौसम में जंगलों में उगने वाले पौधों को हम अपने उपयोग में लाने की कोशिश करते हैं। चकवड़ (वन तुलसी) के बीजों को निकालकर हम बाजारों में 20 से 40 रुपये प्रति किलो बेचते हैं और सीजन में करीब में 200 से 400 रुपये तक की कमाई कर पाते हैं।" ऐसे में बच्चे आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण इस तरह से कमाई करने के लिए मजबूर हैं।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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