मखाने की खेती कर तराई इलाकों के किसान बढ़ा सकते हैं अपनी आमदनी

मखाने की खेती कर तराई इलाकों के किसान बढ़ा सकते हैं अपनी आमदनीमखाने की खेती।

विकास सिंह तोमर, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

सीतापुर (यूपी)। अभी तक मखाने का उत्पादन में बिहार का नाम आता है, लेकिन अब उसी मखाने की खेती सीतापुर जिले में भी हो रही है। तराई के किसान इसके जरिए आसानी से आमदनी बढ़ा सकते हैं।

मखाने का उत्पादन उत्तरी बिहार के कुछ जिलों में होता है। इसकी मांग देश और विदेशों में काफी है। इसका उत्पादन तालाबों में ही होता है। कृषि विज्ञान केन्द्र, कटिया सीतापुर के वैज्ञानिकों के सहयोग से जिले के कई किसानों ने मखाना की खेती की शुरुआत की है।

मखाना की खेती में सबसे खास बात ये होती हैं इसके साथ ही किसान धान की खेती भी कर सकते हैं, प्रदेश के तराई इलाकों के लिए ये खेती वरदान फायदेमंद साबित हो सकती है। केवीके के कृषि वैज्ञानिक योगेंद्र प्रताप सिंह ने बताया, “सीतापुर जिले का काफी क्षेत्र तराई और वहां धान की कटाई के बाद भी पानी भरा रहता है तो किसान दूसरी फसल नहीं ले पाते हैं। मखाने की खेती तलाब के साथ धान वाले खेत में हो सकती है, बस खेत में ढाई से 3 फीट पानी होना चाहिए।“

मखाने की खेती की विशेषता यह है कि इसकी लागत बहुत कम है। मछली वाले तालाब में इसे लगाने से दोहरा मुनाफा हो सकता है। डॉ. योगेंद्र आगे बताते हैं एक एकड़ के तालाब में अगर किसान सीधे बीज बेच ले तो 70 से 80 हजार रुपये लेकिन अगर उन्हें लावा बनाकर बेचे तो तीन गुना ज्यादा मुनाफा हो सकता है। कटिया केवीए के वैज्ञानिक घाघरा और उसके आसपास की तराई के क्षेत्र में किसानों को प्रेरित कर रहे हैं। साथ ही केवीए में इसका प्रदर्शन भी किया जा रहा है।

मखाने उगाने और बनाने की विधि

1.मखाने के फूल कमल की तरह होते हैं जो उथले पानी वाले तालाबों में पाए जाते हैं। इसीलिए जलभराव वाले क्षेत्रों यहां धान के खेतों में भी इसे उगाया जा सकता है। इसकी खेती की खेती के लिए तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तथा सापेक्षिक आर्द्रता 50 से 90 प्रतिशत होनी चाहिए।

2.मखाने की खेती के लिए तालाब चाहिए होता है जिसमें ढाई से तीन फीट पानी होना चाहिए। इसकी खेती में किसी भी प्रकार की खाद का इस्तेमाल नहीं किया जाता। खेती के लिए, बीजों को पानी की निचली सतह पर 1 से डेढ़ मीटर की दूरी पर डाला जाता है।

3.बुवाई के महीने दिसंबर से जनवरी के बीच के होते है। बुवाई के बाद पौधों का पानी में ही लगाया जाता है। इसकी पत्ती के डंठल एवं फलों तक पर छोटे-छोटे कांटे होते हैं। इसके पत्ते बड़े और प्लेटों की गोल-गोल पानी पर तैरते रहते हैं।

4.अप्रैल के महीने में पौधों में फूल लगना शुरू हो जाता है। फूल बाहर नीला, और अन्दर से जामुनी या लाल, और कमल जैसा दिखता है। फूल पौधों पर कुछ दिन तक रहते हैं।

5.फूल के बाद कांटेदार-स्पंजी फल लगते हैं, जिनमें बीज होते हैं। यह फल और बीज दोनों ही खाने योग्य होते हैं। फल गोल-अण्डाकार, नारंगी के तरह होते हैं और इनमें 8 से 20 तक की संख्या में कमलगट्टे से मिलते जुलते काले रंग के बीज लगते हैं। फलों का आकार मटर के दाने के बराबर तथा इनका बाहरी आवरण कठोर होता है। जून-जुलाई के महीने में फल 1-2 दिन तक पानी की सतह पर तैरते हैं। फिर ये पानी की सतह के नीचे डूब जाते हैं। नीचे डूबे हुए इसके कांटे गल जाते हैं और सितंबर-अक्टूबर के महीने में ये वहां से इकट्ठा कर लिए जाते हैं।

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