वीडियो : आप भी कर सकते हैं रेशम कीट पालन, सरकार देती है सब्सिडी, जानें कैसे

दुद्धी (सोनभद्र)। सोनभद्र में मूल रूप से जंगलों में रहने वाले एक हजार परिवार अर्जुन के पेड़ों पर रेशम के कीटपालन का कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में प्रति वर्ष लगभग 80 लाख रेशम कोया से रेशम बनाया जा रहा है, जिसका बाजार मूल्य लगभग एक करोड़ का होता है। भारत में 60 लाख से भी अधिक लोग विभिन्न रेशम कीट पालन में लगे हुए हैं। इनकी रोजी रोटी को जरिया ही यही है।

जिला मुख्यालय से लगभग 130 किमी दूर दुद्धी ब्लॉक के गोविंदपुर गाँव में 10 हेक्टेयर का रेशम फार्म है। इस फार्म के प्रमुख हरी प्रसाद (59 वर्ष) बताते हैं, "रेशम विभाग दुद्धी में रेशम के कीडे़ (ककून) कोल्ड स्टोर करके रखते हैं और फिर जुलाई में फार्म हाउसों को देते हैं। कुछ समय बाद ककून से तितली निकलती है। एक तितली एक हजार से ज्यादा अंडे देती है। अंडों से इल्ली (कीड़े) निकलते हैं, जिनको अर्जुन के पेड़ पर छोड़ते हैं, जिससे रेशम तैयार होती है।"

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गोविंदपुर रेशम फार्म हाउस में पिछले 25 वर्षों से रेशम का धागा बनाने में कार्यरत रजवन्ती देवी (58 वर्ष) बताती हैं, "सबसे पहले कट ककून को उबालते हैं फिर कई घड़ो से रेशा निकालकर मशीन पर चढ़ाते हैं। चार से पांच घड़ों के रेशे से एक धागा बनाया जाता है।" यहां की दूसरी कर्मचारी चमेली देवी (40 वर्ष) बताती हैं, "हमारे फार्म हाउस में ककून से रेशम का धागा बनाने वाली 13 मशीने हैं। एक दिन में 80 ग्राम धागा निकलता है। रेशम के धागे से यहां पर कपड़ा तैयार किया जाता है। एक मीटर कपड़ा 700 से 800 रुपए का बिकता है।"

सरकार द्वारा रेशम कीट पालन को बढ़ावा देने के लिये उत्प्रेरित विकास योजना शुरू की है। इस योजना के तहत रेशम कीट पालन व्यवसाय से जुडऩे वाले किसानों और महिलाओं को पच्चास फीसदी सब्सिडी प्रदान की जा रही है।

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यहां रेशम उत्पादन 30 वर्षों से हो रहा है। यहां के रेशम से बना कपड़ा खादी केंद्र संस्थान, गोरखपुर, बनारस और कई जिलों में जाता है, जिससे अच्छा मुनाफा होता है।





सोनभद्र जिले के सहायक निदेशक (रेशम) पारसी पांडेय बताते हैं, "जिले में 400 एकड़ जंगल में 20 रेशम फार्म है। जंगल क्षेत्र में लगभग 900-1000 परिवारों द्वारा रेशम कोया उत्पादन किया जा रहा है।" पारसी आगे बताते हैं, "वर्तमान में प्रति वर्ष लगभग 80 लाख रेशम कोया उत्पादन हो रहा है, जिसका बाजार मूल्य लगभग एक करोड़ का होता है। जो इन्ही 900 से 1000 परिवारों में वितरित हो जाता है। इस प्रकार प्रति परिवार को 15 से 20 हजार रुपए की आय मात्र 70-80 दिनों में हो रही है जो प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त हो रहा है।"

प्रति वर्ष लगभग 80 लाख रेशम कोया उत्पादन हो रहा है, जिसका बाजार मूल्य लगभग एक करोड़ का होता है। जो इन्ही 900 से 1000 परिवारों में वितरित हो जाता है। इस प्रकार प्रति परिवार को 15 से 20 हजार रुपए की आय मात्र 70-80 दिनों में हो रही है जो प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त हो रहा है।

रेशम की खेती तीन प्रकार से होती है- मलबेरी खेती, टसर खेती व एरी खेती। उत्तर प्रदेश में मलबेरी के लिए 158 फार्म, टसर के 56 फार्म व एरी के तीन फार्म हैं, जिनमें 57 जिलों में रेशम का उत्पादन किया जा रहा है। प्रदेश में कुल 25 हजार रेशम कीट पालक हैं। भारत का रेशम उत्पादन धीरे-धीरे बढ़कर जापान और पूर्व सोवियत संघ देशों से ज्यादा हो गया है, जो कभी प्रमुख रेशम उत्पादक हुआ करते थे। भारत इस समय विश्व में चीन के बाद कच्चे सिल्क का दूसरा प्रमुख उत्पादक है।

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क्या होता है रेशम

रेशम प्राकृतिक प्रोटीन से बना रेशा है। रेशम के कुछ प्रकार के रेशों से वस्त्र बनाए जाते हैं। ये प्रोटीन रेशों में मुख्यतः फिब्रोइन होता है। ये रेशे कीड़ों के लार्वा द्वारा बनाया जाता है। सबसे उत्तम रेशम शहतूत, अर्जुन के पत्तों पर पलने वाले कीड़ों के लार्वा द्वारा बनाया जाता है।

इन राज्यों में होता है सर्वाधिक उत्पाद

भारत में शहतूत रेशम का उत्पादन मुख्यतया कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू व कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में किया जाता है जबकि गैर-शहतूत रेशम का उत्पादन झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों में होता है।

लाभार्थियों को विभाग की तरफ से मिलने वाली सुविधाएं

  1. - कीटपालन कार्य का प्रशिक्षण।
  2. - रेशम पालन से जुड़े सामान देना।
  3. - कीटपालन हेतु रेशम कीटों के अंडों को उपलब्ध कराना।
  4. - कीटपालन उपकरण की व्यवस्था कराना।
  5. - उत्पादित कोया का बिचवाना।
  6. - रेशम कीटपालन के लिए लोगों को प्रेरित करना।

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