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फूलों के नाम से जाना जाता है बाराबंकी का दफेदरपुरवा गाँव

अरुण मिश्रा- कम्यूनिटी जर्नलिस्ट

विशुनपुर (बाराबंकी)। बाराबंकी जिले का दफेदरपुरवा गाँव आज फूलों की खेती के लिए जाना जाने लगा है। गाँव की सीमा में प्रवेश करते ही यहा चारो तरफ रंग बिरंगे फूलों के खेत दिखाई देने लगते हैं। यहां के अधिकतर किसान फूलों की खेती करने लगे है। लगभग एक दशक पहले इस गाँव के किसान आलू व मेंथा की खेती करते थे, लेकिन फूलों की खेती का यहां के किसानों को ऐसा चस्का लगा कि अब यहा का प्रत्येक किसान फूलों की खेती करने लगा है। इस गाँव को फूलों का गाँव कहा जाये तो गलत नहीं होगा।

जिला मुख्यालय से 35 किमी. दूर विकासखंड देवा का दफेदरपुरवा गाँव के प्रगतिशील किसान मोईनुद्दीन ने विदेशी ग्लेडियोलस फूलों की खेती शुरू की थी। पारंपरिक खेती की तुलना में अच्छे मुनाफे ने किसानों का ध्यान इस खेती की ओर खींचा। मोईनुद्दीन से सलाह और मार्गदर्शन लेकर गाँव के कुछ किसानों ने इसकी खेती में अपना हाथ आजमाया। स्टिक और बीजों से हुई अच्छी आय ने किसानों का हौसला बढ़ाया और देखते ही देखते पूरा गांव ग्लेडियोलस की खेती की ओर मुड़ गया। आज हालात यह है कि गाँव के अधिकतर किसान फूलों की खेती करने लगे हैं।

देवा ब्लाक स्थित दफेदरपुरवा के अधिकतर किसान फूलों की खेती करते हैं। इस ग्लैडियोलस की बुवाई जुलाई में की जाती है। जो दिसम्बर के प्रारम्भ में तैयार हो जाती है। फूलों की खेती के लिए पिछले साल गाँव के कई किसानों को अनुदान दिया गया था यदि इस साल भी अनुदान के लिए आवेदन होता है तो सरकार की तरफ से अनुदान दिया जायेगा।
जय करन सिंह, जिला उद्यान अधिकारी बाराबंकी

दफेदरपुरवा निवासी ब्रजेश वर्मा (48 वर्ष) बताते हैं, "फूलों की खेती करने से पहले पारंपरिक खेती करते थे जिसमें मौसमी जोखिम व अन्य समस्याएं बहुत थी। कभी आलू की कीमत अच्छी नहीं मिलती थी कभी फसल में रोग लग जाता था और पूरी फसल चौपट हो जाती थी, लेकिन जब से फूलों की खेती शुरू की है तब से कोई रिस्क नहीं है। फूलों की फसल अच्छा मुनाफा देती है। सहालक के समय मुनाफा और दोगुनर हो जाता है।"

किसान बच्चूलाल (33 वर्ष) बताते हैं, "उचित मार्गदर्शन से खेती से अच्छा मुनाफा हो जाता है। तैयार स्टिक फूलों की मण्डियों में आसानी से बिक जाती हैं। अगर दिल्ली और मुम्बई भेजना होता है तो मोईनुद्दीन के फूलों के साथ ही बाहरी मंडियों में भेजते हैं।" बच्चूलाला आगे बताते हैं, "फिलहाल नोटबन्दी से मन्दी का असर है परंतु हर बार स्टिक और कन्द से अच्छा मुनाफा हो जाता है।"

किसान मुकेश रावत (47 वर्ष) बताते हैं, "ग्लेडियोलस की पहले साल खेती करने पर लागत ज्यादा लगती है, क्योंकि बीज की कीमत ज्यादा होती है। बीज मिलाकर करीब 45 हजार रूपये प्रति बीघे का खर्च आ जाता है। अगले वर्ष बीज की लागत छोड़कर करीब 65 हजार रुपये प्रति बीघा शुद्ध मुनाफा हो जाता है।"

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