घाघरा के टापू पर बसे लोग बोले-“इलेक्शन के टाइम नेता बारु खात आए जात हैं फिर पांच साल दिखाई नाही देत” 

घाघरा के टापू पर बसे लोग बोले-“इलेक्शन के टाइम नेता बारु खात आए जात हैं फिर पांच साल दिखाई नाही देत” घाघरा के तेज बहाव को पार करने के बाद ही यहां के लोग बाकी दुनिया से जुड़ पाते हैं। फोटो- वीरेंद्र

वीरेंद्र शुक्ला, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

सरसंडा (बाराबंकी)। “चुनाव के समय नेता बालू खात अक्सर हमारे गांव आ जाते हैं और कहते हैं भाई बड़ी बालू है, एक बार हमें जिता दो, इलाके में सब सुविधाएं पहुंचा देंगे, लेकिन वोट लेने के बाद कोई नजर नहीं आता है।” गुस्से के साथ तेजन (35 साल) कहते हैं। तेजन की तरह बाराबंकी के हेतमापुर इलाके सैकड़ों लोग गुस्से में हैं।

तेजन बाराबंकी जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर रामनगर तहसील के सरसंडा ग्राम पंचायत के रहने वाले हैं। इनकी ग्राम पंचायत के कुछ गांव घाघरा के पार बहराइच की तरफ हैं। घाघरा पार के गांवों जमका, परशुरामपुर, फाजिलपुर, पूरनपुर और कई गांव अकौना ग्राम पंचायत के हैं, जहां न बिजली पहुंची है और न ही सड़क। स्कूल से लेकर अस्पताल तक पहुंचने के लिए नाव ही सहारा है। जमका गांव में करीब 500 घर लेकिन कोई पक्का नहीं है, सब घासपूस हैं, जिनके बने भी थे वो घाघरा में कट गए।

तेजन बताते हैं, “ हमारे गांव से सबसे नजदीक का कस्बा सूरतगंज है तो करीब 15 किलोमीटर दूर है, नदी और रेता पार करने के बाद 5-6 किलोमीटर के बाद तो पक्की सड़क मिलती है। स्कूल के नाम पर एक प्राथमिक स्कूल है, अस्पताल जाना हो तो 8 किलोमीटर कम से कम जाना होगा।” जमका के ग्राम प्रधान राम अवध निषाद कहते हैं, “कई बार बिजली के सर्वे हुआ लेकिन हुआ कुछ नहीं। ब्लॉक से भी हमें कोई मदद नहीं मिलती। आठ महीने तक पानी से घिरे रहने के बावजूद हम लोगों को ज्यादा सुविधाएं मिलना दूर, बल्कि और उपेक्षा ही होती है।”

बाराबंकी शहर से रोजाना यहां पढ़ाने आने वाली शिक्षिका बॉबी सिंह बताती हैं, इलाके करीब 80 फीसदी आबादी निरक्षर है, जब मेरी यहां तैनाती हुई स्कूल कोई आता नहीं था, मैंने बच्चों को समझा-समझाकर यहां तक लाई, लेकिन इतनी गरीबी में ये लोग बच्चों को पढ़ाए या किसी तरह अपना जीवन चलाएं।” कुछ बच्चे अब पास के कस्बों में पढ़ने जाने लगे हैं लेकिन नाव से आवाजाही के चलते घर वाले डरे रहते हैं।

बाढ़ के डर और गरीबी के चलते इलाके में ज्यादातर मकान हैं घास-पूस के बने हैं।

बाढ़ के चलते यहां साल में एक ही फसल होती है। बाकी वक्त किसानों के खेतों में पानी भरा रहता है। कोल्हू में गन्ना पेर रही जमका की रुकमीना बताती हैं, खेती के अलावा दूसरा कोई काम नहीं है, साल के आठ महीना तो पानी भरा रहता है, गन्ना और गेहूं जैसी एक दो फसलें हो जाती है। कमाई को कोई दूसरा जरिया नहीं है।” समस्या इस घाघरा के उस पार बसे गांवों की नहीं है। हेतमापुर के आसपास के कई गांवों की जमीनें नदी के उस पार हैं। कई किसानों ने रोजगार के लिए गांव छोड़ दिए हैं तो जो बचे हैं वो नाव से नदी पार कर किसी तरह अपना अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं।

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