गाँवों में अब तक नहीं बने पशु रोग निदान लैब

गाँवों में अब तक नहीं बने पशु रोग निदान लैबफोटो: गाँव कनेक्शन।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। पशुपालकों को पशुओं की खून और पेशाब की जांच कराने के लिए भटकना न पड़े, इसके लिए सभी जिलों में पशु रोग निदान लैब बनने वाली थी, पर अभी तक इसका काम भी नहीं शुरु हुआ है।

भेजा गया था पशु रोग निदान लैब बनाने का प्रस्ताव

पशुओं में होने वाली घातक बीमारियों को जानने के लिए उनके खून की और पेशाब की जांच होती है, पर उसकी जांच की रिपोर्ट पाने के लिए पशुपालकों को बहुत समय तक इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में पशुपालकों को आर्थिक नुकसान भी होता है। इसी को देखते हुए विभाग द्वारा रोग निदान लैब बनाने का प्रस्ताव भेजा गया था।

प्रदेश में केवल 10 पशु रोग निदान लैब

रोग निदान लैब बनाने के लिए विभाग को 28 करोड़ रुपए की मंजूरी मिल गई है। प्रत्येक प्रयोगशाला पर 41.33 लाख रुपए की लागत आएगी। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश में कुल दस पशु रोग निदान लैब बनी हुई है। इन लैब में प्रोटोजुआ जनित बीमारी (सर्रा, बबेसिओसिस और आन्तरिक परजीवी-पेट के कीड़े जुएं, चिचड़ी) जैसी बीमारियों का पता लगाने के लिए खून व पेशाब की जांच कराई जाती है। खून की जांच के लिए तीन रुपए और पेशाब की जांच के लिए दस रुपए का खर्चा आता है। पूरे साल में लगभग खून और पेशाब की जांच मिलाकर 600 से 700 सैंपल आते है, जिनकी जांच कराई जाती है।

क्या कहते हैं जिम्मेदार

पशु रोग नियंत्रण और प्रक्षेत्र के निदेशक डॉ. ए.एन. सिंह बताते हैं कि लैब को कहां बनाया जाना है, इसके लिए जगहों को चयनित कर लिया गया है। अभी प्रशासन के पास बजट नहीं है। बजट आते ही जिलों में लैब को बनाने का काम शुरू कर दिया जाएगा। लैब बनने से पशुपालको को काफी लाभ होगा। इससे पशुओं में होने वाले रोग को जल्द से जल्द पुष्टि की जा सकेगी, जिससे पशुपालकों को आर्थिक नुकसान कम होगा।”

अगर सैंपल भेजते भी हैं तो...

लैब न होने से आने वाली दिक्कतों के बारे में शाहजहांपुर जिले के कांट ब्लॉक पशुचिकित्सक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि लैब बनने वाली है पर अभी तक लैब बनी नहीं है। खून और पेशाब की जांच न होने पशुओं का रोग को जल्दी नहीं पहचान पाते हैं। अगर जांच के लिए सैंपल भेजते भी हैं, तब तक हालत बहुत ज्यादा खराब हो जाती है या फिर वो मर जाता है। लैब बनने से समय पर जांच होगी और पशुओं का सही इलाज हो सकेगा।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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