काम ठप: मनरेगा के लाखों मज़दूरों का मेहनताना रुका

Swati ShuklaSwati Shukla   5 Jan 2017 12:44 PM GMT

काम ठप: मनरेगा के लाखों मज़दूरों का मेहनताना रुकामहीनों से भुगतान न होने से मजदूरों ने अब मनरेगा में काम करना ही बंद कर दिया है।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। कुछ साल पहले तक जिस मनरेगा की योजना के लिए ग्राम प्रधान एड़ी-चोटी का जोर लगाते थे, जिस योजना के सहारे वो प्रधानी जीतते आ रहे थे अब वो उसके तहत काम करना नहीं चाहते हैं। उत्तर प्रदेश व देश के कई अन्य राज्यों के ग्रामीण इलाकों में रोजगार का ज़रिया बनी मनरेगा योजना ठंडे बस्ते में जा रही है। महीनों से भुगतान न होने से मजदूरों ने अब मनरेगा में काम करना ही बंद कर दिया है।

यूपी की राजधानी लखऩऊ के ही इंटौजा कस्बे के पास बहादुरपुर गाँव में रहने वाली प्रेमा देवी (40 वर्ष) पहले मनरेगा में काम करती थीं, लेकिन आजकल वो शहर में दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं। प्रेमा बताती हैं, “गाँव में छह महीने काम किया, लेकिन पैसा नहीं मिला, परिवार चलाना था तो शहर (लखनऊ) आ गए।” प्रेमा की तरह ही बाराबंकी जिले के बबुरी गाँव निवासी रमेश चंद्र यादव (55 वर्ष) और पलायन का दंश झेल रहे बुंदेलखंड के ललितपुर जिले की छिंगा सहरिया भी मनरेगा से भुगतान न होने पर मनरेगा छोड़ चुके हैं। दिल्ली से करीब 1000 किमी उत्तर में यूपी के बलिया के रक्तसर गाँव में 700 लोगों ने मनरेगा के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है।

कैसे निकलता आता है मनरेगा का पैसा

ग्राम प्रधान गाँव की जरूरत के अनुसार आईडी जनरेट करवाकर काम शुरू कराते हैं। फिर ब्लॉक का कार्यक्रम अधिकारी पैसे का भुगतान की प्रक्रिया शुरू करते हैं। राज्य केंद्र से आवश्यकतानुसार केंद्र से पैसे की मांग करते हैं। केंद्र ये पैसा राज्यों के अधिकृत खातों में भेजता है जहां से संबंधित एजेंसियां अपने खर्च के मुताबिक पैसा ले लेती हैं।

जबकि 500 सक्रिय आईडी हैं लेकिन पिछले एक वर्ष में यहां सिर्फ 25 लोगों को 20-25 दिन का रोजगार मिला है। गाँव की प्रधान और जिला प्रधानसंघ की अध्यक्ष स्मृति बताती हैं, “मनरेगा का पैसा नहीं मिल रहा है, इसलिए हमने सिर्फ 80 हजार का काम करवाया, वो पैसा भी चार महीने में किसी तरह मिला। केंद्र पैसा नहीं देगा तो मजदूर मेरे घर पर हंगामा करेंगे। मनरेगा के पैसे की लेटलतीफी ने हम (प्रधान) लोगों की छवि पर बट्टा लगा दिया है।” एमबीए की डिग्री धारक और हाल में रानीलक्ष्मी बाई पुरस्कार से सम्मानित स्मृति आगे बताती हैं कि उनके जिले की करीब 950 ग्राम पंचायतों का यही हाल है।

उत्तर प्रदेश में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) के तहत 163.48 लाख जॉब कार्ड दिए गए हैं, जबकि मजदूरों की संख्या 237.03 लाख है।

मनरेगा की वेबसाइट के अनुसार करीब 106.41 लाख मजदूर सक्रिय रूप से काम भी करते हैं लेकिन अब इनमें हजारों मजदूर मनरेगा के तहत शायद ही काम करें। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में मनरेगा का करीब 1500 सौ करोड़ रुपये बाकी है। यूपी में मनरेगा की उपायुक्त प्रतिभा सिंह बताती हैं, “जून के बाद नवंबर माह में सिर्फ मजदूरी का करीब 750 करोड़ आया था, जबकि मैटेरिय़ल कंपोनेंट (सामग्री) का पैसा नहीं मिला है। फिलहाल मानकर चलिए करीब 1500 करोड़ रुपये यूपी का बाकी है।” मनरेगा का काम रुकने के बारे में पूछने पर वो बताती हैं, समय पर भुगतान न होने का असर जरुर पड़ा है लेकिन सरकारी काम है तो पैसा मिलना ही है, इसलिए काम जारी रहता है।”

हालात सिर्फ यूपी में बदतर नहीं हुए हैं। देश के 10 राज्यों ने पैसे का भुगतान न होने पर केंद्र सरकार को पत्र लिखा है जबकि पैसे की लेटलतीफी के चलते कई राज्यों में मजदूर दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं। राजस्थान में पलायन की खबरें आई हैं तो कर्नाटक में भी असर दिखाई दे रहे है।

पिछले दस वर्षों में 27 करोड़ लोगों को रोजगार देने वाली मनरेगा योजना को वर्ष 2014 में विश्व बैंक ने अपनी विश्व विकास रिपोर्ट में ग्रामीण क्षेत्र में विकास का बेहतरीन उदाहरण बताया था लेकिन अपने आगाज से ही फर्जी जॉब कार्ड और पंचायत स्तर पर घोटाले के सारे में घिरी रही मनरेगा में लेटलतीफी यूपीए सरकार के आखिरी दिनों में शुरू हुई, जो अब नासूर बन गई है।

वर्ष 2008 से मनरेगा में काम करने के बाद कुछ दिनों पहले अपनी अस्थाई नौकरी छोड़ने वाले हरदोई जिले के डाटा ऑपरेटर गौरव श्रीवास्तव बताते हैं, “मजदूरों के साथ हम लोगों की सैलरी में भी लगातार देरी हो रही थी 2008 के बाद से आज तक 8 हजार रुपए का ही भत्ता मिल रहा था, फिर जबसे इलेक्ट्रानिक फंड मैंनेजमेंट सिस्टम शुरु हुआ मनरेगा के भुगतान में लगातार देरी होती गई। लगातार बढ़ती समस्याओं के चलते ही मैने काम छोड़ दिया।” मनरेगा की राशि पहले प्रधानों के खातों में आती थी लेकिन लगातार आ रही भ्रष्टाचार की शिकायतों को देखते हुए यूपीए सरकार के आखिरी दिनों में ई-एसएमएस यानि इलेक्ट्रानिक फंड मैंनेजमेंट सिस्टम शुरू किया गया, जिसके तहत पैसा अब सीधे मजदूरों के खातों में जाता है।

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