अब ग्रामीणों को नहीं रास आते सांस्कृतिक कार्यक्रम

अब ग्रामीणों को नहीं रास आते सांस्कृतिक कार्यक्रमएक समय था गाँव में सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उमड़ती थी ग्रामीणों की भीड़।

कम्यूनिटी जर्नलिस्ट: वीरेन्द्र शुक्ला

छेदा (बाराबंकी)। ग्राम टेड़वा जिला बाराबंकी में हाल में तीन दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम मनाया गया। इस कार्यक्रम में नाममात्र की भीड़ देखने को मिली। सांस्कृतिक कार्यक्रम को देखने का या करने का, जिस तरह आज से लगभग 15 वर्ष पहले जो ग्रामीणों का उत्साह होता था, आज उस उत्साह में कमीं आ चुकी है। आजकल लोग वीआईपी बने सिनेमाघरों में जाना पसंद करते हैं। शोर-शराब वाले माहौल को लोग ज़्यादा महत्व दे रहे हैं और लोगों का रुझान सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तरफ बिलकुल भी नही है।

अब लोग नहीं देते ध्यान

इस मामले में गाँव कनेक्शन टीम ने जब सांस्कृतिक कार्यक्रम को प्रदर्शित करने वाले त्रिभुवन यादव से बात की तो उन्होंने बताया कि आजकल सांस्कृतिक कार्यक्रम पर लोग ध्यान नही देते हैं। वे फ़िल्मी दुनिया के शिकार हो चुके हैं। अब उन्हें वही पसंद भी आता है। जबकि उसके उपरांत हमारी संस्कृति लोगों को काफी कुछ सिखाती है। मेल मिलाप की भावना, देवी देवताओं का अच्छा ज्ञान भी कराती है। आजकल के लोगों को अच्छा सन्देश भी देती है पर आज कल सब इलेक्ट्रॉनिक का ज़माना है। लोगों के पास मोबाइल हैं, लैपटॉप हैं, टेलीविजन हैं, लोग उसी पर मनोरंजन कर लेते हैं। इन्ही सब कारण की वजह से हम सभी कलाकारों की मांग कम होती जा रही है।

अब खत्म होने की कगार पर है

जय श्री सिद्धेश्वर राम लीला पार्टी के मैनेजर आनंद पाल यादव का कहना है कि लोगों के मन से सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने का उत्साह कम हो गया है। कुछ लोग आज भी हैं, जो सांस्कृतिक कार्यक्रम को पसंद करते हैं। मगर 80 % लोगों के अंदर से उत्साह ख़त्म होता जा रहा है। हम और हमारे साथियों के पास यही एक मात्र जरिया है कमाई का, अब वो भी ख़त्म होने के कगार पर हैं।

धीरे-धीरे हो रहा है पतन

गाँव के राम विजय (35 वर्ष) ने बताया कि जब हम छोटे थे तो अपने पिता जी के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने जाया करते थे पर अब माहौल बदल रहा है, जिसके पास टीवी नही था, वो अब टीवी ले आया और आज कल सभी के पास मोबाइल है। लोग अपने-अपने मोबाइल में ही व्यस्त रहते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम को करने के लिए न तो अब अच्छे लोग बचे हैं और न ही देखने वाले लोग। सांस्कृतिक कार्यक्रम का अब धीरे-धीरे पतन हो रहा है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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