नर्सरी बेड बनाकर प्याज लगाने से बढ़ता है उत्पादन

नर्सरी बेड बनाकर प्याज लगाने से बढ़ता है उत्पादनप्याज की खेती में किसान नर्सरी के बेड बनाकर कर रहे खेती।

कम्यूनिटी जर्नलिस्ट: अजय चौरसिया (30 वर्ष)

सिद्धार्थनगर। दिसम्बर से जनवरी महीना प्याज की खेती के लिए सही समय होता है। ऐसे में किसान अगर नर्सरी बेड बनाकर प्याज लगाता है तो उसका उत्पादन और भी अधिक बढ़ जाता है।

तरीका सीख रहे किसान

बसावनपुर गाँव के किसान राम अवतार कहते हैं, "हम लोग अभी तक ऐसे ही प्याज लगा देते हैं, लेकिन अब हमें प्याज लगाने का सही तरीका बताया जा रहा है। इससे हमें प्याज का उत्पादन भी ज्यादा होगा और लागत भी कम लगती है।" पौध के लिये क्यारी ऐसे स्थान पर बनानी चाहिए, जहां पर सिंचाई और पानी के निकास का अच्छा प्रबंध हो। भूमि समतल और उपजाऊ होनी चाहिए। आसपास छाया वाले वृक्ष नहीं होने चाहिए। पौध तैयार करने के लिए प्याज के नर्सरी बेड की चौड़ाई 75 सेमी., बेड की ऊंचाई 6 इंच होनी चाहिए।

ऐसे तैयार करें क्यारियां

इस आकार की 50 क्यारियां एक हेक्टेयर में रोपण के लिए पर्याप्त होती हैं। बीज बोने से पहले क्यारी की गुड़ाई करनी चाहिए। प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में चार-पांच ग्राम कैप्टन या थायरम मिलना चाहिए। प्रत्येक क्यारी में 15-20 किग्रा अच्छी तरह सड़ा हुआ गोबर का खाद और 10-15 ग्राम दानेदार फ्यूराडान मिला देना चाहिए। क्यारी को समतल करने के बाद 8-10 सेमी की दूरी पर 1.2 सेमी गहरी नालियाँ बनाकर क्यारी तैयार कर लेना चाहिए।

इसलिए मिलता है अच्छा उत्पादन

प्याज की नर्सरी बेड बनाकर लाइन से लगाते हैं क्योंकि उसमें बीज की मात्रा कम लगती हैं और प्याज का उत्पादन ज्यादा और बड़ा होता है। बेड के दोनों तरफ नाली बनाते हैं, जिससे जो बीज बेड पर लगी होती है, उसको दोनों तरफ से पानी मिलता रहता है। क्यारी तैयार होने के बाद बीज को फफूंदनाशक दवा जैसे– कैप्टान या थायरम (2.0-2.5 ग्राम प्रति किग्रा बीज) से अवश्य उपचारित कर लेना चाहिए ताकि प्रारम्भ में लगने वाली बीमारियों के प्रकोप से पौधे बच सकें। इस प्रकार उपचारित बीज को तैयार क्यारियों में बो देना चाहिए। बुवाई के बाद बीज को मिट्टी और सड़े गले गोबर के खाद के मिश्रण से ढककर उसके ऊपर कांस और पुआल आदि की एक पतली परत बिछा देना चाहिए, जिससे तेज धूप तथा वर्षा से बीज की रक्षा हो सके। यह परत भूमि में नमी बनाये रखने में भी सहायक होती है। बीज बोने के तुरंत बाद क्यारी में फव्वारे या हजारे से हल्की सिंचाई करना चाहिए। इसके बाद एक दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए।

ताकि पौधों को धूप और हवा लगे

जब बीज का जमाव (अंकुरण) हो जाये तो कांस अथवा पुआल की परत को हटा देना चाहिए ताकि पौधों को धूप व हवा लगे। नर्सरी में आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई और निराई करते रहने से छह-सात सप्ताह बाद पौध रोपाई के लायक हो जाती है। अंकुरण के बाद कैप्टान या थायरम या डायथेन एम-45 (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) का घोल पौधों की जड़ों के पास मृदा में डालने (ड्रेंनचिंग) से जड़ गलन तथा अन्य बीमारियों का भय नहीं रहता है। आवश्यक हो तो 10-15 दिन बाद फिर ड्रेंनचिंग करना चाहिए।

क्षारीय और अधिक अम्लीय न हो भूमि

प्याज की फसल के लिए समशीतोष्ण जलवायु की अवश्यकता होती है। अच्छे कन्द बनने के लिए बड़े दिन तथा कुछ अधिक तापमान होना अच्छा रहता है। कन्द बनने से पहले 12.8-230 सेल्सियस तापमान तथा कन्दों के विकास के लिए 15.5-210 सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है। आमतौर पर सभी किस्म की भूमि में इसकी खेती की जाती है, लेकिन उपजाऊ दोमट मिट्टी, जिसमे जीवांश खाद प्रचुर मात्रा में हो व जल निकास की उत्तम व्यवस्था हो, सर्वोत्तम रहती है। भूमि अधिक क्षारीय व अधिक अम्लीय नहीं होनी चाहिए अन्यथा कन्दों की वृद्धि अच्छी नहीं हो पाती है। अगर भूमि में गंधक की कमी हो तो 400 किलो जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की अन्तिम तैयारी के समय कम से कम 15 दिन पूर्व मिलायें।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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