किराये पर जमीन लेकर शुरू की पपीते की खेती, आज कमा रहे लाखों रुपये

किराये पर जमीन लेकर शुरू की पपीते की खेती, आज कमा रहे लाखों रुपयेपपीते की खेती में किसान रामचंद्र ने बदली अपनी किस्मत।

कम्यूनिटी जनर्लिस्ट: वीरेंद्र शुक्ला

सूरतगंज (बाराबंकी)। परिस्थितियों के हाथों इंसान हार जाता है, लेकिन कुछ लोग परिस्थितियों से सीखते हैं और आगे बढ़ कर अपना मुकाम हासिल करते हैं। कुछ ऐसा ही बाराबंकी जिले के एक छोटे से गाँव में रहने वाले रामचंद्र ने कर दिखाया है। कुछ वर्ष पहले उनकी एक एकड़ जमीन तक गिरवी रखी थी और खाने के लिए दो समय की रोटी भी नसीब नहीं होती थी, मगर रामचंद्र की आगे बढ़ने की ललक ने आज इन्हें एक संपन्न किसान बना दिया है। रामचंद्र ने पपीते की खेती की ओर रुख किया और अपनी किस्मत बदल दी। आज गाँव के दूसरे किसान भी उन्हें देख कर पपीते की खेती कर रहे हैं।

पूरे परिवार का गुजर-बसर करना था मुश्किल

बाराबंकी स्थित सूरतगंज ब्लॉक के पास छोटे से गाँव टपरा में रहने वाले रामचंद्र वर्मा को पारिवारिक परम्परा की वजह से जिम्मेदारियों का बोझ भी जल्द ही उठाना पड़ा। वे बताते हैँ, "एक समय था जब एक एकड़ खेती से पूरे परिवार का गुजर-बसर करना काफी मुश्किल होता था। खेत में गेहूं, चावल और मक्का की फसल तो कई बार बोई, लेकिन लाभ के नाम पर कुछ नहीं मिला। समय बदलने के साथ-साथ आर्थिक स्थिति और बिगड़ती गई। जीविकोपार्जन भी मुश्किल होने लगा। समय ने ऐसी करवट ली कि दो बच्चों को भरपेट भोजन मिल सके, उसके लिए खेत गिरवी रखना पड़ा।"

तब शुरू की पपीते की खेती

कुछ न कर पाने के कारण हालात बद से बदतर हो गए। परिवार की हालत देख समझ में आ गया कि हाथ पर हाथ रखे रहने से कुछ नहीं होगा, बल्कि कुछ तो करना ही पड़ेगा। वर्ष 2011 में अपनी गिरवी रखी जमीन को भाड़े पर लेकर पपीते की खेती करने का विचार मन में आया। उन्होंने बिना समय गंवाए कुछ उन्नत किस्म के पपीते पूसा नन्हा, चड्ढा सिलेक्शन, रेड लेडी व अन्य अच्छी किस्म का चयन कर खेती करना शुरू किया। अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ा क्योंकि शुरुआत में कम पानी की वजह से पपीते की फसल चौपट हो गई, जिससे पूरी मेहनत पर पानी फिर गया। इससे मन में और उदासीनता घर करने लगी।

एक बार फिर की नई शुरुआत

धैर्य के सिवा अन्य कोई रास्ता भी नहीं बचा था, लेकिन राम चंद्र ने हौसला जुटाया और हार न मानने की कसम खाई और एक बार फिर पपीते की खेती में जुट गए। इस बार की गई मेहनत से सफलता मिली जो कि पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई। पपीते का उत्पादन इतना अधिक हुआ कि सभी खर्चे निकालने के बाद लगभग पांच लाख का फायदा हुआ। इसके बाद से आर्थिक स्थिति में सुधार होता गया। लगातार कड़ी मेहनत और लगन के चलते उन्होंने जमीन को कर्ज से मुक्त करा लिया और बच्चों को अच्छे स्कूल में प्रवेश दिला दिया, जहां वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

पपीते की खेती करते-करते पांच वर्ष बीत गए। अब तो आस-पास के किसान भी मुझसे प्रेरणा लेकर पपीते की बागवानी करने लगे हैं। बच्चों को भी अच्छे स्कूल में पढ़ा रहा हूं।
रामचंद्र, किसान

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

Share it
Top