गन्ने की पेड़ी जलाने से हवा में घुल रहा ज़हर

गन्ने की पेड़ी जलाने से हवा में घुल रहा ज़हरखेतों की उर्वरा शक्ति के नुकसान के साथ ही पर्यावरण हो रहा प्रदूषित।

रबीश कुमार वर्मा: कम्यूनिटी जर्नलिस्ट (27 वर्ष)

फैजाबाद। फसलों की कटाई के बाद शेष बची फसल को न जलाने के लिए समय-समय आदेश जारी किए जाते हैं। इससे खेतों की उर्वराशक्ति में आने वाली कमी के बारे में भी जागरूक किया जाता है। फिर भी कृषक खेतों में आग लगा देते हैं। इन दिनों गन्ने की फसल कटने के बाद बचे अवशेषों को जलाया जा रहा है। कुछ महीने पहले धान की कटाई के बाद पराली में आग लगा देने से दिल्ली में धूंए का कोहरा छा गया था।

दिल्ली सहित आस-पास के अन्य प्रदेशों में छाए स्मॉग की चर्चा विश्व भर में हुई थी। उस समय भी किसानों को पराली या फसलों के अवशेष को जलाने के लिए मना किया गया था। इसके बावजूद कृषक जागरूक नहीं हो पा रहे हैं। इस कारण प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। राम (35 वर्ष) बताते हैं, “हम लोग गन्ने की खेती करते हैं। गन्ने की फसल के बाद गेहूं की फसल बोने से पहले खेतों को साफ करने के लिए खेतों में बचे गन्ने की पत्तियां व अन्य बचे अवशेष को जला दिया जाता है। जलाने के बाद खेत की जुताई करके गेहूं तथा अन्य फसल की बुवाई की जाती है।” कई राज्यों में फार्मिंग में खेती की जाती है तो धान की कटाई मशीनों द्वारा की जाती है।

ऐसे में यहां पराली बड़े पैमाने पर जलाई जाती है, लेकिन फैजाबाद व अन्य कई जनपद में ज्यादा फार्मिंग खेती का प्रचलन नहीं है। धान की फसल की कटाई यहां मजदूर हाथ से करते हैं। लिहाजा बहुत कम किसान यहां पराली को जलाने का काम करते हैं। लेकिन, यहां बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है। करीब दो साल फसल लेने के बाद किसान गन्ने की पेड़ी को खत्म करके गेहूं की बुवाई करते हैं। लिहाजा खेतों में ही जला देते हैं।

क्या कहता है विज्ञान

बता दें कि फसल कटाई के बाद मिट्टी पलट हल से खेतों की जुताई करने पर यह बची हुई डंठल और खरपतवार मिट्टी में दब जाते हैं जो बाद में खाद का काम करते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि साथ ही पत्तियों को मल्चिंग के रूप में उपयोग करें। इसे बाद में मिट्टी में दबा दिया जाता है। गन्ने के एक एकड़ खेत से 3 से 4 टन पत्तियां प्राप्त होती हैं। जिसमें आर्गेनिक कार्बन 28.6 प्रतिशत, नाईट्रोजन 0.35 से 0.42 प्रतिशत, फास्फोरस 0.04 से 0.15 प्रतिशत तथा पोटाश 0.42 से 0.50 प्रतिशत होता है। गन्ने की पत्तियों से बनाये गये कम्पोस्ट में 0.50 प्रतिशत नाईट्रोजन, 0.20 प्रतिशत फास्फोरस, 1.10 प्रतिशत पोटाश तथा अन्य सूक्ष्म तत्व पाये जाते हैं, जिससें मिट्टी की उर्वराशक्ति में वृद्धि होती हैं।

क्यों नहीं जलानी चाहिए फसल

मानव जीवन के लिए तथा पेड़-पौधों के लिए आवश्यक जीव भी खेतों में आग लगाने से जल जाते हैं। इससे खेतों की उर्वराशक्ति के साथ ही वातावरण का पारिस्थिक संतुलन भी डगमगा जाता है। वहीं, आग लगाने से होने वाले धूंए से वातावरण प्रदूषित हो जाता है। जमीन में उपस्थित सूक्ष्म जीवाणु, जो फसलों के लिए बेहद लाभदायक माने जाते हैं वे इस कार्य से खत्म हो रहे हैं। केंचुआ को किसान का मित्र कहा गया है मगर इस आग में वे भी जल जाते हैं। ऐसे में हमारे शत्रु कीटों की संख्या बढ़ती जा रही है। वायु में सल्फर डाइआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड व अन्य कण मिलकर बीमारियां भी फैलाते हैं।

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