किशोरी सुरक्षा योजना का नहीं मिल रहा लाभ, स्कूलों में अब भी नहीं बांटे जा रहे सेनेटरी पैड 

किशोरी सुरक्षा योजना का नहीं मिल रहा लाभ, स्कूलों में अब भी नहीं बांटे जा रहे सेनेटरी पैड फोटो: विनय गुप्ता

स्वयं डेस्क

लखनऊ। दो साल पहले किशोरी सुरक्षा योजना की शुरुआत की गई थी। इसके तहत यूपी के सरकारी स्कूलों में किशोरियों को नि:शुल्क सेनेटरी पैड बांटना तय किया गया था। साथ ही सालभर में एक छात्रा को 13 पैड देना तय किया गया है। मगर यह व्यवस्था प्रदेश में सही तरह से अब भी लागू नहीं हो सकी है। एक सर्वे के मुताबिक हर तीन में से एक लड़की माहवारी के दौरान स्कूल नहीं जाती है।

कानपुर देहात जिले के अकबरपुर इंटर कॉलेज में 10वीं में पढ़ने वाली जमीला (15 वर्ष) सकुचाते हुए बताती हैं, ‘अगर स्कूल में पढ़ने के दौरान माहवारी होती है तो पैड नहीं मिल पाते हैं। इससे पढ़ाई के दौरान बीच में ही घर जाना पड़ता है।’ वहीं, औरैया जिले के बालिका इंटर कॉलेज में 11 वीं में पढने वाली अनिका शर्मा का कहना है, ‘मेरे स्कूल में कभी भी सेनेटरी पैड नहीं दिए गए।’ 2-8 दिसंबर 2016 तक चले देश के सबसे बड़े ग्रामीण उत्सव स्वयं फेस्टिवल के दौरान गाँव कनेक्शन ने एक लाख से अधिक किशोरियों से बात की। इस दौरान किशोरियों से हुई बातचीत में पता चला कि उनके स्कूल में सेनेटरी पैड नहीं मिलते हैं और न ही पैड बदलने की कोई सुरक्षित जगह है।

2015 में लागू हुई थी किशोरी सुरक्षा योजना

किशोरियों में माहवारी विषय को लेकर गलत धारणाओं व मिथकों को दूर करने और उन्हें व्यक्तिगत स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के लिए वर्ष 2015 में “किशोरी सुरक्षा योजना” की शुरुआत सरकारी विद्यालयों/परिषदीय विद्यालयों में अध्यनरत किशोरियों के लिए की गयी थी। इस योजना के शुरू होने के दो साल बाद भी ये धरातल पर पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं हो पायी है।गाँव कनेक्शन की टीम ने कई जिले के सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिकाओं से बात की तो कुछ ने कहा हमें कभी भी सेनेटरी पैड नहीं मिले तो कुछ ने कहा एक साल पहले सेनेटरी पैड मिले थे।

एक साल में दिए थे छह सेनेटरी नैपकिन

सोनभद्र जिले के राबर्टगंज के राजकीय बालिका इंटर कॉलेज की प्रधानाध्यापिका ऊषा सिंह का कहना है कि हमने पिछले वर्ष एक लड़की को एक साल में छह सेनेटरी पैड दिए थे। वे आगे बताती हैं कि लड़कियों के पैड निस्तारण के लिए स्कूल में इन्सीरेटर भी लगाया गया है जिससे उन्हें निस्तारण में कोई परेशानी न हो।

इस स्कूल में 12 वीं में पढ़ने वाली श्वेता ने कहा कि हमे माहवारी के दौरान स्कूल में टीचर के पास आसानी से पैड मिल जाते हैं लेकिन पहले दिन हम स्कूल नहीं आते हैं क्योंकि पेट में दर्द होता है और असहज महसूस करते हैं।

क्या कहते हैं आंकड़ें

  • स्कूल वाश रिपोर्ट 2016 वाटर ऐड इंडिया के अनुसार-
  • यूपी में 13 प्रतिशत स्कूलों में पैड निष्कासन (इन्सीरेटर) की सुविधा है
  • 11 प्रतिशत स्कूलों में माहवारी के दौरान कपड़े और पैड इस्तेमाल करने के लिए टायलेट्स में हुक्स की व्यवस्था है।
  • आदर्श प्रोजेक्ट के बेसलाइन सर्वे में 94.5 प्रतिशत किशोरियों ने बताया कि उनके स्कूल के शौचालय में शीशे नहीं लगे हैं।
  • ये सर्वे लखनऊ जिले के 8 ब्लॉक के 80 स्कूलों की 20 हजार किशोरियों के साथ किया गया था।
  • 70 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय में कूड़ेदान की व्यवस्था नहीं है।

क्या है किशोरी सुरक्षा योजना

सरकारी विद्यालयों में कक्षा 6 से 12 तक पढ़ने वाली किशोरियों को व्यक्तिगत स्वच्छता और माहवारी के विषय से जुडी गलत धारणाओं व मिथकों को दूर करने के लिए किशोरी सुरक्षा योजना की शुरुआत की गयी। इस योजना के अंतर्गत सभी परिषदीय स्कूलों में एक किशोरी को 13 सेनेटरी पैड देने की व्यवस्था की गयी है।

किशोरी सुरक्षा योजना” स्टेट गवर्मेंट का कार्यक्रम है। प्रदेश के कस्तूरबा गांधी स्कूल को छोड़कर सभी स्कूलों के लिए फ्री सेनेटरी पैड देने की सुविधा शुरू की गयी थी। इस योजना का उद्देश्य ये था कि लड़कियां जागरूक हों और जो लड़कियां माहवारी के दिनों में स्कूल नहीं जाती हैं वो स्कूल जाना शुरू करें। एक प्रयास है माहवारी के दिनों में लडकियों की पढ़ाई न छूटे और वो माहवारी में पैड के इस्तेमाल को लेकर जागरूक हों।
डॉ. स्वप्ना दास, महाप्रबंधक, मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रम , लखनऊ

शिक्षिकाएं कहती हैं

इस सर्वे में 83 प्रतिशत शिक्षिकाओं ने कहा कि स्कूल में सेनेटरी पैड उपलब्ध रहते हैं, 88 प्रतिशत ने कहा कि हम स्कूल में माहवारी विषय पर बात करते हैं, 94 प्रतिशत शिक्षिकाओं ने कहा हम सिर्फ लड़कियों को इस विषय पर बताते हैं।

छात्राएं क्या कहती हैं

कई जिले की छात्राओं ने गाँव कनेक्शन की टीम को बताया कि उन्हें स्कूल में सेनेटरी पैड नहीं मिलते हैं और न ही निपटान की समुचित व्यवस्था है जिससे उन दिनों स्कूल नहीं जा पाते हैं।

अभिभावक बोले

95 प्रतिशत अभिभावकों ने कहा कि अगर स्कूल में माहवारी के दिनों में सेनेटरी पैड और निपटान की सही व्यवस्था हो तो हमारी लड़कियां उन दिनों भी नियमित तौर पर स्कूल जाएंगी।

अगर हर महीने छात्राओं को स्कूल में माहवारी कि दिनों में पैड आसानी से उपलब्ध हो जाएं तो निश्चित तौर पर किशोरियों की संख्या स्कूलों में माहवारी के दिनों में भी बढ़ सकती है।
डॉ. नीलम सिंह, स्त्री रोग विशेषज्ञ,लखनऊ

छात्राओं ने बयां किया दर्द

वात्सल्य एनजीओ ने एक बैंक के साथ मिलकर माहवारी के दौरान स्कूल-कॉलेजों में पढ़ रही छात्राओं के सामने आने वाली दिक्कत का जिक्र किया था। इस सर्वे में 61.6 प्रतिशत किशोरियों ने कॉलेज न जाने की वजह बताते हुए कहा था कि कहीं कपड़ों पर दाग न आ जाए इस डर के चलते वह स्कूल नहीं जाती हैं। वहीं, 41.2 प्रतिशत किशोरियों ने कहा था कि पेट में दर्द और असहज महसूस करने के कारण वह स्कूल में पढ़ने नहीं जाती हैं। 13 प्रतिशत छात्राओं ने इस बात को स्वीकार किया था कि उनके घर के लोग माहवारी के समय उन्हें स्कूल नहीं जाने देते हैं। हालांकि, इस पूरे मामले में छात्राओं ने माहवारी से पढ़ाई में होने वाले नुकसान की बात को भी स्वीकारा था।

सेनेटरी बंटे तो स्कूल आएंगी छात्राएं

सर्वे में 70 प्रतिशत लड़कियों ने कहा था कि स्कूल में कूड़ेदान की व्यवस्था नहीं है। केवल 12.9 प्रतिशत लड़कियों और 2.7 प्रतिशत लड़कों ने कहा कि शौचालय में बंद कूड़ेदान है। सर्वे में 87 प्रतिशत लड़कियों ने कहा कि अगर माहवारी के दौरान स्कूल में सेनेटरी पैड उपलब्ध हो जाएं तो हम स्कूल जाएंगे।

खुलकर आज भी नहीं की जाती बात

इस सर्वे में पूछे गए कई सवालों के जवाब में प्रदेश की छात्राओं ने इस बात को स्वीकार किया था कि माहवारी के बारे में उनसे खुलकर बात नहीं की जाती है। आज भी समाज में यह शारीरिक परिस्थिति एक टैबू के तहत अपनाए जाते हैं। 77.6 किशोरियों ने कहा माहवारी की जानकारी हमें अपने आसपास से सुनने को मिल जाती है, 62 प्रतिशत ने कहा कि हमे हमारी मां बताती हैं जबकि 11 प्रतिशत ने कहा कि हमें हमारी शिक्षिकायें बताती हैं।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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