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सितंबर से फरवरी के बीच करें मूली की बुवाई, कम लागत में कमाएं अधिक मुनाफा

सितंबर से फरवरी के बीच करें मूली की बुवाई, कम लागत में कमाएं अधिक मुनाफामूली की खेती 

मोविन अहमद/स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

रायबरेली। इस समय किसान मूली की बुवाई कर अच्छा मुनाफा कमा सकता है, छोटी जोत के किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफे वाली खेती है। इसे हर जगह आसानी से लगाया जा सकता है।

बछरावां ब्लॉक के राजकीय बीज भण्डार के प्रभारी वीरेन्द्र कुमार सिंह ने मूली की फसल के बारे में बताते हुए कहा, “आज के समय में यह कहना कि मूली सिर्फ इसी मौसम में लगाई जाती है या लगाई जाना चाहिए, उचित नहीं होगा, क्योंकि मूली हमें हर मौसम व समय में उपलब्ध हो जाती है। मैदानी क्षेत्रों के लिए सितम्बर से फरवरी तक का समय उत्तम होता है।”

मूली की खेती के लिए हल्की दोमट मिट्टी अधिक उत्तम होती है। पांच से छह बार जुताई कर खेत को तैयार किया जाए। एक हेक्टेयर खेती के लिए आठ से दस किलो बीज पर्याप्त होता है। जुताई के बाद खेत को मयाने के पश्चात बीजों की बुवाई करें ,बीजों की दूरी लगभग 45 सेमी. रखें। बीज अंकुरण के बाद जब पौधा पांच से छह सेमी. का हो जाये तब खुरपी या छोटे फावड़े से गुड़ाई कर पौधों की जड़ों में मिट्टी को चढ़ा दें।

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कीट व रोग प्रबंधन

मूली को कुछ कीट ही क्षति पहुंचाते हैं, जिसमे एफिड्‌स व पत्ती काटने वाले कीड़े का प्रकोप अधिक होता है ,दोनों पर रोगोर या मेलाथियान के द्वारा नियन्त्रण किया जा सकता है। मूली की पत्तियों में मुख्यता धब्बा रोग लगता है इस पर बेवस्टिन या डाइथेन एम-45 या जैड-78 के दो प्रतिशत के घोल से नियन्त्रण कर सकते हैं। मूली की जड़ों की अच्छी बढ़त के लिए आवश्यक है कि हम नमी का पर्याप्त ध्यान रखें। इसके लिए आवश्यकता पड़ने पर सिंचाई की व्यवस्था करनी चाहिए। मूली की फसल खुदाई के लिए 25 से 70 दिन में तैयार हो जाती है। विभिन्न किस्मों के पकने का समय प्रायः अलग-अलग होता है। अतः कृषक भाई खुदाई का अवश्य ध्यान रखें, क्योंकि खुदाई में थोड़ा भी विलंब जड़ों को खराब कर देता है, जिससे मूली खाने योग्य नहीं रह पाती।

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उर्वरकों का प्रयोग

किसान भाई अपने खेत का भूमि परीक्षण अवश्य कराएं ताकि उन्हें यह मालूम हो सके कि उनके खेत में किस उर्वरक की आवश्यकता अधिक है। परीक्षण उपरांत ही वे अपने खेत में दी जाने वाली उर्वरकों व खाद की मात्रा निर्धारित करें। मूली की पैदावार के लिए गोबर की कम्पोस्ट खाद का भरपूर उपयोग करें। साथ ही इसमें 75 किग्रा नत्रजन, 40 किग्रा फास्फोरस व 40 किग्रा पोटाश देना चाहिए। गोबर से बनी कम्पोस्ट खाद खेत की तैयारी के समय ही डाल देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा पोटाश व फास्फोरस की पूरी मात्रा अंतिम जुताई में दे देनी चाहिए।

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