#स्वयंफेस्टिवल: ताकि ‘जेल की रोटी’ ज़हर ना बने

#स्वयंफेस्टिवल: ताकि ‘जेल की रोटी’ ज़हर ना बनेकानपुर में जेल के कैदियों की स्वास्थ्य जांच के लिए गई चिकित्सकों की टीम

उमेश पंत / राजीव शुक्ला

कानपुर. जिला जेल कानपुर में तब माहौल कुछ बदल गया जब गाँव कनेक्शन फाउंडेशन के स्वयं प्रोजेक्ट के तहत जेल में कैदियों की सेहत के हाल जानने चिकित्सकों की टीम वहां जा पहुची. कैदियों के मुताबिक़ ऐसा पहली बार हो रहा था कि इस तरह से उनके स्वास्थ्य की सुध कोई ले रहा हो. कैदियों के बच्चों को चौकलेट और टौफ़ियाँ मिली तो उनके भी चेहरे कुछ देर के लिए खिल उठे.

सीएमओ आर पी यादव के नेतृत्व में 2 चिकित्सकों, 4 पुरुष स्वास्थ्यकर्मियों और 2 महिला स्वास्थ्यकर्मियों की टीम ने जेल में न केवल कैदियों के ब्लड प्रेशर, वजन और पल्स की जांच की बल्कि उन्हें दवाइयां भी बांटी.

देशभर के कैदखानों में बंदियों की स्थिति बहुत चिंताजनक है. एक आंकड़े के मुताबिक़ देशभर में 2,82,076 कैदी विचाराधीन हैं. यानी की कुल कैदियों के 70 फ़ीसदी कैदी ऐसे हैं जिनपर अभी फैसला सुनाया जाना बाकी है. इनमें से कई ऐसे ही भी जिन्हें इस वजह से बेल नहीं मिल पाती कि उनके पास इसके लिए पैसे नहीं हैं. परेशानी ये है कि कैदियों की ये संख्या जेलखानों की क्षमता से काफ़ी ज़्यादा है. इन कैदखानों में जगह और स्टाफ़ दोनों की कमी है.

जेलखानों में स्टाफ़ की कमी के कारण कैदियों के स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया जाता, जबकि भारत का संविधान हर नागरिक को सम्मानजनक तरीके से जीने का अधिकार देता है. भारत की जेलों में 27,000 पद ऐसे हैं जो खाली पड़े हैं. और जेलों में चिकित्सकों की संख्या तो और भी चिंताजनक है. हर 638 कैदियों के लिए केवल 1 डॉक्टर है. ये आंकड़ा कम ही सामने आ पाता है लेकिन जेलों में हर दिन करीब पांच लोगों की मौत हो जाती है.

कैदखानों में होने वाली इन मौतों की वजह कैदियों का मानसिक रूप से स्वस्थ्य न होना भी है. अच्छी खासी तादात उन कैदियों की भी है जो आत्महत्या कर लेते हैं. इस स्थिति के बावजूद आलम ये है कि 23 हज़ार कैदियों पर केवल 1 मनोचिकित्सक जेलों के लिए मौजूद है.

ये आंकड़े बताने के लिए काफ़ी हैं कि जेल की सलाखों के भीतर अमानवीय स्थितियों में रह रहे बंदियों के लिए सकारात्मक पहल की कितनी ज़रुरत है. स्वयं फ़ेस्टिवल के तहत जेल में किया गया स्वास्थ्य परीक्षण इस स्थति को सुधारने में उठाया गया एक छोटा सा कदम है.

गाँव कनेक्शन फाउंडेशन के इस प्रयास को रामकृष्ण मिशन और गैर सरकारी संस्था साहवेस के साथ ज़िला जेल प्रसाशन और स्वास्थ्य विभाग का भरपूर सहयोग मिला.

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