फिर से बाराबंकी बनेगा अफीम का हब

फिर से बाराबंकी बनेगा अफीम का हबफोटो: साभार गूगल।

कम्यूनिटी जर्नलिस्ट: प्रदीप सारंग

बाराबंकी। उत्तर प्रदेश की जिला बाराबंकी की जमीन कभी अफीम उत्पादन की दृष्टि से सर्वोत्तम मानी जाती रही है। औसतन सर्वाधिक उत्पादन एवं श्रेष्ठ गुणवत्ता की अफीम पैदा करने का रिकॉर्ड बनाने वाला उत्तर प्रदेश अब मध्य प्रदेश से पिछड़ चुका है। कारण है मध्य प्रदेश की कंकरीली जमीन, जिसमें पानी नहीं रुकता। खेती के लिए अभिशाप बनी वहाँ की कंकरीली जमीन अफीम के रिकॉर्ड उत्पादन के लिए वरदान साबित हो रही है। वहां का मौसम भी यहां की तुलना में काफी अच्छा होता है।

अब 8 की बजाए 13 जिलों में होगी अफीम की खेती

कभी रिकॉर्ड उत्पादन करने वाले उत्तर प्रदेश की सुध फिर से विभाग ने ली है। अफीम उत्पादन बढ़ाने के नये निर्णय से बाराबंकी सहित एक दर्जन जनपदों में काश्तकारों की संख्या बढ़ने जा रही है। उत्तर प्रदेश के इकलौते डिवीजन बाराबंकी सहित इसी वर्ष से 13 जिलों में 96 हेक्टेयर अफीम की खेती की जायेगी, जबकि पिछले वर्ष आठ जनपद थे और इस वर्ष पांच जनपद बढ़ जाएंगे। इस प्रकार वर्तमान में बाराबंकी, फैज़ाबाद, लखनऊ, रायबरेली, गाज़ीपुर, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर आदि जिलों में 416 कस्तकारों पर विभाग ने भरोसा जताया है। यह भरोसा कितना टिक पायेगा यह तो समय ही बताएगा, क्योंकि चुनौतियां न तो कास्तकारों के पास कम हैं और न ही विभाग के पास।

54 किलो प्रति हेक्टेयर निर्धारित

किसानों की मानें तो आज से 25 वर्ष पूर्व और आज के तापमान तथा मौसम में बहुत बदलाव आ गया है। बाराबंकी के जिला अफीम अधिकारी एलआर दिनकर बताते हैं, "मध्य प्रदेश की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी 54 किलो औसत प्रति हेक्टेयर निर्धारित कर दिया गया है, जबकि विगत में 45-47 किलो प्रति हेक्टेयर देने वालों को ही नयी स्वीकृति दी जा रही है।" फ़िलहाल उप्र के काश्तकारों को विश्वास है कि विभाग द्वारा उनकी मांग पर विचार करके औसत पर्ता घटाकर 47 ही कर दिया जाएगा। 400 किमी दूर से अफीम को निजी सुरक्षा में लाना भी किसानों की चिंता में शामिल है।

मगर मुश्किलें कम भी नहीं है

एलआर दिनकर बताते हैँ, "बाराबंकी डिवीजन की बात करें तो स्टाफ की कमी से 800 किमी की दूरी का कमांड एरिया होना प्रमुख चुनौतियां है। मौजूदा समय बाराबंकी में दो की जगह एक ही इंस्पेक्टर है। इसके अलावा चार की जगह एक दारोगा, 10 की जगह सिर्फ तीन हवलदारों से ही काम चलाया जा रहा है। चौकीदार एवं वाहन चालक, हैं ही नहीं। एक वाहन लखनऊ आफिस से मंगवाकर काम चल रहा है।" याद रहे कभी बाराबंकी में दो डिवीजन हुआ करते थे, किंतु इस समय एक ही है वह भी अव्यवस्थित। परिणाम यह है कि मौजूदा स्टाफ अपने स्वास्थ्य को दांव पर लगाकर काम को अंजाम दे रहा है। सवाल यह है कि काश्त का रकबा बढ़ाने की योजना बनाते समय, संसाधन और स्टाफ बढ़ाये जाने पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता है? दूरी को देखते हुए अगर तीन संग्रह केन्द्र एवं उपकेंद्र बना दिए जाएं तो विभाग व किसान दोनों को सुविधा होगी।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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