‘शौचालय की व्यवस्था नहीं इसलिए माहवारी के दौरान स्कूल नहीं जा पाते’ 

‘शौचालय की व्यवस्था नहीं इसलिए माहवारी के दौरान स्कूल नहीं जा पाते’ गांव कनेक्शन फाउंडेशन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में डॉ. अनिल त्रिपाठी

श्रीवत्स अवस्थी, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

उन्नाव। माहवारी को लेकर आज भी महिलाएं और किशोरियां अंधविश्वास के साथ जीवन जी रही हैं। घरों में उन दिनों पर महिलाओं को अछूत घोषित कर दिया जाता है। ऐसे में जरूरत है कि महिलाओं व किशोरियों को महावारी के दौरान खुद को साफ रखने के साथ ही अंधविश्वास की बेड़ियों से बाहर आना चाहिए। रविवार को जनपद के सरोसी ब्लॉक के कंजौरा स्थित उपकेंद्र में विश्व महावारी दिवस पर गाँव कनेक्शन फाउंडेशन की ओर से आयोजित किए गए जागरुकता कार्यक्रम में डॉ. अनिल त्रिपाठी ने कही।

गाँव कनेक्शन फाउंडेशन की ओर से आयोजित किए गए जागरुकता कार्यक्रम की शुरुआत के समय कुछ ही महिलाएं कार्यक्रम में पहुंची थी लेकिन समय बीतने के साथ ही महिलाओं की संख्या दो सौ के ऊपर पहुंच गई। कार्यक्रम में महिलाओं ने महावारी को लेकर आने वाली समस्याएं चिकित्सकों से साझा की। इस दौरान चिकित्सकों ने उनकी समस्याओं को समझा और उनका निदान भी बताया।

डॉ. अनिल त्रिपाठी का कहना था कि आज के समय में भी महावारी को लेकर बहुत सी भ्रांतिया फैली हुई हैं जिसमें सबसे अधिक महावारी को अछूत घोषित कर दिया जाता है। महिलाओं को घरों में कुछ भी छूने से मना कर दिया जाता है। कई जगह तो उनका खाना भी बदल दिया जाता है। डॉक्टर ने महिलाओं की समस्या सुनी।

जागरुकता कार्यक्रम के दौरान महिलाओं ने सेनेटरी पैड को लेकर बताया कि अभी भी गांव में उन्हें आसानी से पैड नहीं मिल पाते। मेडिकल स्टोर कई किलोमीटर दूर हैं। ऐसे में पैड लाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है जिस पर दो सौ महिलाओं व किशोरियों को जागरुकता कार्यक्रम में आशा व एएनएम द्वारा पैड उपलब्ध कराए गए। यहां आशा अर्चना ने कहा कि अब किसी भी समय महिलाएं व किशोरियों उनसे पैड ले सकती है।

कार्यक्रम में डॉ. आईएम तव्वाब ने कहा, ‘माहवारी के दौरान महिलाओं के शरीर में कई तरह के बदलाव भी आते हैं जिससे परेशानियां बढ़ जाती हैं। साफ-सफाई न रखने से इंफेक्शन फैलने का खतरा बन जाता है। महिलाओं का चाहिए कि वह समय-समय पर अपना हेल्थ चेकअप कराते रहें। सफाई के साथ ही हरी सब्जियों और आयरन की गोलियां भी लें। किशोरियों को बताया गया कि वह कॉटन का प्रयोग न करें। स्वास्थ्य केंद्र से उन्हें पैड उपलब्ध हो जाएंगे।'

कार्यक्रम में गाँव में ही रहने वाली रोशनी (18 वर्ष) ने कहा, "माह के उन दिनों में वह स्कूल नहीं जा पाती हैं। स्कूल न जा पाने की वजह पर बताया कि स्कूल में शौचालय अलग से नहीं बनवाए गए हैं। ऐसे में उन्हें पैड को निस्तारित करने में समस्या का सामना करना पड़ता है जिसकी वजह से उन दिनों वह घर पर ही रहती हैं।" यह समस्या सिर्फ रोशनी की ही नहीं थी बल्कि उनके साथ पढ़ने वाली हर छात्रा की है।

रोशनी की तरह ही सुंदारा (22 वर्ष) ने बताया, "महीने के तीन से चार दिन वह स्कूल नहीं जाती। माहवारी को लेकर अभी भी लोगों में अंधविश्वास भरा हुआ है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अभी भी महीने के उन दिनों में महिलाओं को अछूत मानते हैं।"

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