मेरा गाँव किसने तबाह किया ?

सुंदरवन में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का सामना कैसे कर रहे हैं लोग, पढ़ें ख़ास रिपोर्ट...

Nidhi JamwalNidhi Jamwal   26 Oct 2019 6:37 AM GMT

सागर द्वीप समूह, सुंदरवन

पार्वती दास ने सुमति नगर में अब तक 60 गर्मियाँ बितायी हैं, यह उनका पैतृक गाँव है जो सुंदरवन डेल्टा के सागर द्वीप समूह में स्थित है। तीन वर्ष पहले उनके गाँव और गाँव के लोगों को समुद्र के बढ़ते जल स्तर से बचाने के लिए बनाया गया तटबंध ढह गया।

तब से सरकार ने अनेक बार इसे बनाने का प्रयास किया लेकिन समुद्र ने हर बार इस तटबंध को तबाह किया। पार्वती जो एक विधवा हैं और तीन बच्चों की माँ हैं, वे बताती हैं, "मैंने बचपन से सागर को अपने द्वार पर आते देखा है।"

उनके पुत्रों में से दो पुत्र मछुआरे हैं और सूखी मछलियाँ बेचते हैं। तीस वर्ष का उनका तीसरा पुत्र शक्ति दास शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम है और अपने दैनिक क्रियाकलापों के लिए पूरी तरह से उन पर आश्रित है।

"तटबंध के टूटने से मेरे दोनों मछुआरे पुत्रों की जमीन समुद्र में समा गयी जिसमें वे मछलियाँ सुखाया करते थे। वे दोनों अपने जीवनयापन का साधन ढूँढने के लिए इस द्वीप समूह से चले गए,"वे बताती हैं। उनका एक पुत्र 2000 किलोमीटर दूर तमिलनाडु में निर्माण क्षेत्र में मजदूर बन कर काम कर रहा है, जबकि दूसरा पुत्र केरल चला गया है, लेकिन पार्वती कहीं नहीं जा सकतीं।

"जल्द ही समुद्र मेरी झोपडी को भी निगल जाएगा, लेकिन मैं बिस्तर में पड़े अपने लाचार पुत्र शक्ति को लेकर कहाँ जाऊं?" चिंता भरे शब्दों में शक्ति के चेहरे से लार पोंछते हुए वे पूछती हैं, जो अपनी बूढ़ी माँ को बोलता देखकर उत्साह से हँस रहा था।

सुमति नगर में रहने वाली पार्वती दास और उनका पुत्र जिनका कोई दूसरा ठिकाना नहीं है। फोटो : निधि जम्वाल

भारत के सुंदरवन डेल्टा के समुद्री किनारों पर बसा सागर द्वीप समूह सबसे बड़ा द्वीप है। इसकी जनसँख्या भी काफी ज्यादा है और इन गाँवों में रहने वाले पुरुष जीवनयापन के साधन ढूँढने के लिए विस्थापित हो गए हैं, और बुजुर्गों, बीमारों की देखभाल एवं बच्चों की परवरिश के लिए महिलाओं को यहाँ छोड़ गए हैं। ये महिलाएं जलवायवीय परिवर्तन के कारण तेजी से होने वाले भूमि क्षरण और जीवनयापन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की गवाह हैं।

"सुंदरवन में लोगों की आजीविका का मुख्य साधन प्रमुख रूप से धान की खेती और मछली पकड़ने से जुड़े व्यवसाय हैं," गाँव कनेक्शन के दल को समुद्र विज्ञान विभाग, जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता के प्रोफेसर तुहिन घोष ने बताया कि कुछ लोग शहद एकत्रीकरण के व्यवसाय से भी जुड़े हैं।

वे अपनी बात रखते हुए कहते हैं, "हमारे द्वारा किये गए वैज्ञानिक शोध इंगित करते हैं कि जलवायुवीय परिवर्तन के साथ-साथ अनेक कारणों से इस द्वीप समूह का कृषि उत्पादन घटता जा रहा है जिस कारण लोगों को जीवन यापन के दूसरे साधन ढूँढने पड़ रहे हैं और वे यहां से पलायन को मजबूर हैं। खेती करने वाले लोगों की संख्या भी द्वीप में घटी है।"

सुंदरवन में कृषि उत्पादन घटने के कारण लोगों को जीवन यापन के दूसरे साधन ढूँढने और पलायन पर मजबूर होना पड़ा है। फोटो : निधि जम्वाल

सुंदरवन

सुंदरवन एक ज्वार-भाटे वाला स्थान है जो विशालकाय गंगा-ब्रह्मपुत्र दोआब क्षेत्र में लगभग 40,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में भारतवर्ष और बांग्लादेश में फैला है। यह बंगाल बेसिन में तीन नदियों - गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना के द्वारा लाये गए अवसादों से बना है।

सुंदरवन विश्व का सर्वाधिक बड़ा दलदली वनक्षेत्र भी है (लगभग 10,000 वर्गमीटर, जिसमे 40 प्रतिशत हिस्सा भारत में है और शेष बांग्लादेश में है)।

सुंदरवन डेल्टा के भारत में स्थित क्षेत्र में कुल 102 द्वीप समूह हैं, जिसमें से केवल 54 पर आबादी है, बाकी सब वनों से आच्छादित हैं। आबादी वाले ये द्वीप समूह 4.6 मिलियन जनसँख्या को समायोजित करते हैं। यहां के लोग भारत की सबसे गरीब जनता में से एक हैं।

वर्ष 2018 के एक शोधपत्र 'भारत के सुंदरवन प्रायद्वीप में कृषि उत्पादन, पारिवारिक दरिद्रता और पलायन' के अनुसार 4.6 मिलियन जनसँख्या में से 34 प्रतिशत विभिन्न द्वीपों में रहते हैं जो बेहद गरीब हैं और 75 प्रतिशत परिवारों में कम से कम एक सदस्य भारत के दूसरे राज्यों में काम कर रहा है।

भारत के सुंदरवन की 4.6 मिलियन जनसँख्या में से 34 प्रतिशत लोग बेहद दरिद्रता में रह रहे हैं। फोटो : निधि जम्वाल

भूमि का कटाव और घटता कृषि उत्पादन

भारत के सुंदरवन प्रायद्वीप के जिन 54 आबादी वाले द्वीप समूहों में भूमि का कटाव और कृषि उत्पादन घटा है, सागर द्वीप उनमें से एक है। इसमें 42 गाँव या मौजा हैं। घोरामारा द्वीप सागर द्वीप के उत्तर में स्थित है जो 4.8 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है, जबकि मौसानी द्वीप का क्षेत्रफल 24 वर्ग किलोमीटर है।

किसी भी अन्य प्रायद्वीप की तरह, यह भी नदियों द्वारा लाये गए अवसादों के समुद्री किनारे पर जमाव से बना है। सुंदरवन के द्वीप समूह मिट्टी के कटाव और संवृद्धि के कारण लगातार परिवर्तित होते रहते हैं। तटबंधों के बार-बार टूटने, डूबने, बाढ़, किनारों के कटाव, चक्रवात और तूफानों के कारण ये खतरे में हैं।

सन 2014 की 'लैंडस्केप्स एंड लैंडफॉर्म्स इन इंडिया' नाम की पुस्तक के सुंदरवन पर आधारित एक अध्याय के अनुसार, नदियों के द्वारा लाये गए अवसादों के जमाव के कारण सुंदरवन प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है। मई से सितम्बर तक जब नदियाँ सबसे ज्यादा मिट्टी उत्सर्जित करती हैं, तब नदियों के मुहाने से पश्चिम तटीय क्षेत्रों तक इन अवसादों का परिवहन होता है और फिर दिन में दो बार ज्वार के उफान के दौरान ज्वारीय नालों में इनका परिवहन होता है। बंगाल के तटीय इलाकों में नदियों के बहाव और तीव्र ज्वारीय लहरों के मिले-जुले प्रभाव से यह एकत्रित अवसाद ज्वारीय द्वीप समूहों के अंदरूनी इलाकों तक पहुँच जाता है।

संवृद्धि के अलावा, सुंदरवन के द्वीप समूह मिट्टी के कटाव का भी सामना करते हैं जो विशेषज्ञों के अनुसार एक प्राकृतिक प्रक्रिया के साथ-साथ वातावरण में बदलाव एवं समुद्री स्तर बढ़ने के मिले-जुले असर के कारण है।

उदाहरण के लिए, एक अध्ययन के अनुसार 1969 और 2009 के बीच सुंदरवन प्रायद्वीप ने 210.247 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र खो दिया है। (नक्शा देखें: भारतीय सुंदरवन परिक्षेत्र में संवृद्धि और कटाव के क्षेत्र, सन 1969 से 2009 तक)।

नक्शा: भारतीय सुंदरवन परिक्षेत्र में संवृद्धि और कटाव के क्षेत्र, सन 1969 से 2009 तक।


शोधार्थी सुंदरवन में समुद्र स्तर बढ़ने के अलग-अलग परिद्रश्य बताते हैं। उदाहरण के लिए सन 2016 के एक शोधपत्र में उल्लेखित ज्वार के गेज आधारित आंकड़े जो हल्दिया और डायमंड हार्बर से एकत्रित किये गए, इनके अनुसार सन 1950 से 2014 के बीच डायमंड हार्बर में वार्षिक समुद्र तल की ऊँचाई 6.8 मीटर से बढ़कर 7.23 मीटर हो गयी। इसी तरह 1970 से 2014 तक हल्दिया में वार्षिक समुद्र तल की ऊँचाई 6.92 मीटर से बढ़कर 7.17 मीटर हो गयी।

"इस प्रकार की वार्षिक समुद्र तल की ऊँचाई के अनेक अध्ययन सिद्ध करते हैं, कि सुंदरवन में प्रतिवर्ष 2 मिलीमीटर से लेकर 14 मिलीमीटर की दर से समुद्र तल की ऊँचाई बढ़ती जा रही है। बहुत सी जमीन सुंदरवन में इस तरह से समुद्र में समाती जा रही है और नयी ज़मीन उभरती जा रही है," घोष जी का कहना है।

उनके अनुसार जलवायुवीय बदलाव एक महत्वपूर्ण कारक है जो यहां के निवासी लोगों की जीवनयापन शैली में प्रभाव डालता है। समुद्र तल में बदलाव के साथ-साथ इस इलाके में वर्षा का प्रारूप भी बदल चुका है। हालाँकि कुल वर्षा का परिमाण बढ़ा है, किन्तु वर्षा के कुल दिन कम हो गए हैं। उनका कहना है कि तेज बारिश के कारण कृषि पर प्रभाव पड़ा है।

घोष कृषि पर पड़े दुष्प्रभावों के लिए मिट्टी की क्षारीयता को भी दोष देते हैं। नदियों में क्षारीयता बढ़ने के कारण केकड़े और मछलियों की संख्या कम हुई है और दलदली वनों की प्रजातियों पर भी असर पड़ा है।

वर्ष 2018 के एक अध्ययन जिसमें भारतीय सुंदरवन प्रायद्वीप के पश्चिमी सीमा का अध्ययन था, जिसमें सागर द्वीप, घोरामारा द्वीप और मौसानी द्वीप शामिल हैं, उनके किनारों के मानचित्र से पता चला कि तटीय क्षेत्रों की तटरेखा, मिट्टी के कटाव और संवृद्धि के कारण बदल गयी है। इस कारण कृषि पर भी प्रभाव पड़ा है।

वर्ष 1990 से 2015 के बीच सागर, घोरामारा और मौसानी द्वीपों में कटाव की दर क्रमशः 0.2 वर्ग किलोमीटर, 0.02 वर्ग किलोमीटर और 0.08 वर्ग किलोमीटर थी।

जैसे-जैसे खेती अनुत्पादक होती गयी, मिट्टी में और कटाव होता गया, सुंदरवन के सबसे ज्यादा गरीब लोग बचे रहने के लिए दूसरी जगह जाने लगे।

सागर ब्लॉक के 14 गाँवों में लगभग 227 हेक्टेयर खेती की ज़मीन खत्म हो चुकी है। फोटो : निधि जम्वाल

'सब नदी ते पोरे गेचे'

('मेरी पूरी ज़मीन नदी में समा गयी')

सत्रह-अठारह वर्ष पहले तक सुनीता दोलोई और उसका परिवार घोरामारा द्वीप पर रहता था, जहां उनके पति के परिवार की 40-50 बीघा (6.4–8 हेक्टेयर) खेती की ज़मीन हुआ करती थी। खेती उनके जीवनयापन का मुख्य साधन था।

"धीरे-धीरे समुद्र हमारी ज़मीन खाता गया। अंत में हमारी सारी ज़मीन समुद्र में समा गयी और हमें घोरामारा छोड़ना पड़ा," सुनीता ने बताया।

अब वे सागर द्वीप के कमलापुर गाँव में रहती हैं जहां सरकार ने उनके परिवार को 1.5 बीघा (0.24 हेक्टेयर) ज़मीन दी है।

"डेढ़ बीघा ज़मीन में कोई क्या कर सकता है? हमने इसमें घर बनाया है और कुछ सब्जियां उगाई हैं। मेरे पति पुकुर (तालाब) मछली बेचते हैं और मौसम के अनुसार काम की तलाश में निकल जाते हैं। मैं अपने ससुराल पक्ष और बच्चों की देखभाल करती हूँ,"उन्होंने 'गाँव कनेक्शन' को बताया।

लाल मोहन दास (63 वर्ष) दो दशक पहले ही ज्वार की भयावहता को समझ गए थे जब उनकी घोरामारा में स्थित 12 बीघा ज़मीन को समुद्र ने लील लिया था। "लगभग 23 वर्ष पहले मैंने सागर द्वीप के बंकिम नगर गाँव में तीन बीघा ज़मीन खरीदी और घोरामारा को अलविदा कह दिया। अब मैं यहां धान उगाता हूँ, जबकि मेरा पुत्र केरल में मकान बनाने का काम करता है। उसकी पत्नी हमारे साथ गाँव में रहती है," लाल मोहन ने बताया।

तिरसठ वर्ष के लाल मोहन दास की घोरामारा में स्थित 12 बीघा ज़मीन 20 वर्ष पहले समुद्र ने लील ली। फोटो : निधि जम्वाल

लेकिन सागर द्वीप के पूर्वीय क्षेत्र में स्थित बंकिम नगर गाँव की ज़मीन सुरक्षित नहीं है। यहां के मूल निवासी भी अब अपनी जमीन खोते जा रहे हैं। वे दावा करते हैं कि पिछले तीन दशकों में उनके गाँव की कम से कम 100 बीघा (16 हेक्टेयर) जमीन खत्म हो चुकी है और तटबंध तीन बार टूट चुका है लेकिन सुधारा नहीं जा सका है।

बंकिम नगर के 51 वर्षीय अशोक मंडल ने दावा किया कि सन 2014 में वे अपनी 7 बीघा (1.1 हेक्टेयर) जमीन खो चुके हैं जब समुद्र ने गाँव का एक बड़ा हिस्सा अपने में समा लिया था। अब मेरे पास सिर्फ 10 कट्ठा (0.06 हेक्टेयर) ज़मीन बची है, जिसमे मैं सुपारी की खेती करता हूँ, उन्होंने बताया।

इस दौरान बंकिम नगर की संध्या मंडल अपनी 10 बीघा (1.6 हेक्टेयर) ज़मीन खो चुकी हैं और अब उनके पास खेती की कोई ज़मीन नहीं बची। "मेरे पति मौसम के अनुसार द्वीप से बाहर चले जाते हैं, जबकि मैं दिहाड़ी मजदूरी करती हूँ जिससे परिवार की जरूरतें पूरी होती हैं," वे बताती हैं।

वे बात जोड़ते हुए कहती हैं, "आदमी लोग बाहर जा सकते हैं, किन्तु हम औरतों को यहीं रुक कर घर संभालना पड़ता है।"

कुछ इसी प्रकार की कहानी सागर द्वीप के पश्चिमी हिस्से में 15 किलोमीटर दूर बेगुआखल्ली गाँव से आयी।

तीस वर्ष पहले पार्वती दास, अशीम दास से शादी करके बेगुआखल्ली गाँव आयीं। तब से वे देख रही हैं कि समुद्र उनके झोपड़े के पास आता जा रहा है। वर्ष 2009 में जब ऐला चक्रवात ने भारत के पश्चिमी तटों पर तबाही मचाई थी, तब पार्वती और उनके पति ने अपना सब कुछ खो दिया था।

"हमारा घर और 15-16 बीघा (2.4–2.5 हेक्टेयर) ज़मीन समुद्र में चली गयी। अब हमारे पास सिर्फ दो बीघा ज़मीन बची है, जो मेरे पति और उनके चार भाइयों के हिस्से में है। मेरे पति काम के लिए पलायन कर जाते हैं और मैं यहां बच्चों की देखरेख करती हूँ," पार्वती ने बताया।

उसने गाँव की नयी जगह पर एक नया घर बनाया है लेकिन समुद्र पहले ही उसके पास तक आ चुका है। ज्यादा बताते हुए वे कहती हैं, "उच्च ज्वार के दौरान समुद्री पानी हमारे घर में घुस जाता है, तब हम तटबंध पर शरण लेते हैं।"

बेगुआखल्ली गाँव की पार्वती दास समुद्री स्तर बढ़ने के कारण अपना घर और 15-16 बीघा ज़मीन दोनों खो चुकी हैं। फोटो : निधि जम्वाल

पर्यावरणीय शरणार्थी

क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क इन साउथ एशिया (सीएएनएसए) के डायरेक्टर संजय वशिष्ठ के अनुसार गैर सरकारी संगठनों का एक अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क पर्यावरणीय बदलावों पर कार्य कर रहा है, सुंदरवन में पर्यावरणीय परिवर्तनों के कारण होने वाला विस्थापन एक बड़ी चिंता का विषय है।

जैसे-जैसे सुंदरवन के गाँव समुद्र में समाते जा रहे हैं, वहाँ के लोग केरल, तमिलनाडु, गुजरात और अन्य राज्यों में पलायन करते जा रहे हैं। वशिष्ठ 'गाँव कनेक्शन' को बताते हैं कि एक द्वीप से दूसरे द्वीप पर भी आंतरिक विस्थापन हो रहा है। वे आगे कहते हैं, कि अभी तो द्वीप के लोगों में आपस में कोई समस्या नहीं है, लेकिन यदि विस्थापन इसी तरह से होता रहा तो भविष्य में यह समस्या का रूप ले लेगा, क्योंकि सुंदरवन में ज़मीन की कमी है।

वशिष्ठ गलत नहीं हैं।

बंकिम चन्द्र हजरा जो सागर द्वीप से विधायक हैं बताते हैं, "अकेले सागर ब्लॉक में, जिसमें सागर द्वीप, घोरामारा और लोहाचारा द्वीप शामिल हैं, लगभग 227 हेक्टेयर खेती की ज़मीन 14 गाँवों से खत्म हो चुकी है।"

सन 1960 से लेकर सागर, घोरामारा और लोहाचारा द्वीप से 1120 से ज्यादा परिवार सागर द्वीप के अलग-अलग स्थानों में बस चुके हैं। "शुरू में प्रत्येक विस्थापित परिवार को 2.08 एकड़ (0.8 हेक्टेयर) ज़मीन घर बनाने और खेती करने के लिए दी जाती थी, लेकिन उसके बाद अब हम केवल एक एकड़ (0.4 हेक्टेयर) ज़मीन हर परिवार को दे रहे हैं," उन्होंने बताया।

सागर द्वीप के जिबंताला गाँव का मामला ले लीजिये, जहाँ लगभग 500 परिवार हैं। "इनमें से लगभग 150-200 परिवार घोरामारा द्वीप से आये हैं, जिसका एक हिस्सा समुद्र में समा चुका है। सरकार ने हर परिवार को स्थानीय नदी के किनारे 1.5 बीघा ज़मीन घर बनाने के लिए दी है," 40 वर्ष की जिबंताला की निवासी आसिमा बीबी बताती हैं।

उनके तीन लड़के हैं और सभी अपने घर और परिवार से 1,500 किलोमीटर दूर हैदराबाद में भवन-निर्माण में मजदूर का काम करते हैं। मैं गाँव में ही चाय की एक छोटी दुकान चलाती हूँ और अपनी बहुओं एवं पौत्रों का ख्याल रखती हूँ, अपनी बात में जोड़ते हुए वे बताती हैं।

वहाँ के स्थानीय निवासी और विस्थापितों के बीच झगड़े की गुंजाइश के बारे में पूछने पर वे बताती हैं कि विस्थापन से निश्चित रूप से उपलब्ध संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। उदहारण के लिए जिबंताला में परिवारों की पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए केवल 4 नलकूप हैं। पास सटे हुए कमलापुर गाँव में तो 80 परिवारों के बीच केवल एक नलकूप है।

"लेकिन घोरामारा से आये हुए लोग भी इंसान हैं, और उनके भी बच्चे हैं, जिनको पाल-पोस कर बड़ा करना है। वे समुद्र में अपनी ज़मीन खो चुके हैं, इसलिए हम अपने संसाधन उनसे बाँटते हैं," आसिमा बीबी का कहना है।

लेकिन, बिना अतिरिक्त कृषि भूमि की उपलब्धता के सुंदरवन में पर्यावरणीय शरणार्थी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह हैं।

बुजुर्ग कुशल दास (85 वर्ष) डोलोई सागर द्वीप के कमलापुर गाँव में अपेक्षाकृत नए हैं। वे 125 बीघा (20 हेक्टेयर) ज़मीन अपने पैतृक स्थान घोरामारा में खो चुके हैं जो उनके और 6 भाइयों के बीच संयुक्त थी। बदले में उन्हें केवल 1.5 बीघा ज़मीन मिली।

"ऐला चक्रवात में हमने अपनी 15-16 बीघा खेती की ज़मीन खो दी, लेकिन उसके बदले हमें कोई कृषि भूमि या मौद्रिक मुआवजा नहीं मिला, हालाँकि सरकार ने हमें घर का मुआवजा दिया," बेगुआखल्ली गाँव की पार्वती दास बताती हैं।

ढाबला राधिकापुर गाँव के रतिकांत मल्लिक दावा करते हैं कि बढ़े समुद्र स्तर के कारण वे अपनी 1.6 हेक्टेयर ज़मीन खो चुके हैं। सरकार ने खेती की ज़मीन के बदले कोई मुआवजा नहीं दिया है। बल्कि, ऐला चक्रवात के बाद हमारे गाँव में तटबंध बनाने के लिए ज़मीन ले ली। शिकायत भरे लहजे में वे कहते हैं, "लेकिन आज तक वह काम भी ना हो पाया।"

रतिकांत मल्लिक की शिकायत है कि सरकार ने उनके गाँव में टूटे हुए तटबंध का पुनर्निर्माण नहीं किया है। फोटो : निधि जम्वाल

किनारों पर तटबंध

हालाँकि तटबंध स्थानीय नागरिकों के मन में सुरक्षा की भावना पैदा करते हैं, लेकिन वे भी द्वीपों के डूबने के कुछ संभव कारणों में से एक हैं क्योंकि प्रायद्वीप के उस हिस्से में अफवाहों का पहुंचना रुक जाता है।

"संपूर्ण भारतीय सुंदरवन क्षेत्र में 3,500 किलोमीटर लम्बा तटबंध है। इसमें से, 176 किलोमीटर ऐला चक्रवात के दौरान साफ़ हो गया और 777 किलोमीटर हिस्से को कुछ नुकसान हुआ। अन्य 1,043 किलोमीटर दूसरे कारणों से नष्ट हो गया," हजरा ने बताया.

इस प्रकार भारतीय सुंदरवन क्षेत्र सुरक्षित करने के लिए बनाया गया आधे से ज्यादा तटबंधीय हिस्सा या तो बचा ही नहीं, अथवा आधा नष्ट हो चुका है।

दोनों राज्य सरकारें और केंद्र सरकार इन तटबंधों को बनाने और मजबूत करने के लिए कार्य कर रही हैं।

सुरक्षा के लिए बनाया गया आधे से ज्यादा तटबंधीय हिस्सा या तो बचा ही नहीं, अथवा आधा नष्ट हो चुका है। फोटो : निधि जम्वाल

"ऐला चक्रवात के दौरान, 176 किलोमीटर लंबा तटबंधीय हिस्सा नष्ट हो गया। केंद्र को इसके सुधार के लिए 1,339 करोड़ रुपए देने थे, लेकिन अभी तक उन्होंने केवल 673 करोड़ रुपए ही दिए हैं। इस दौरान, हमने (राज्य सरकार) तटबंध बनाने में 150 करोड़ रुपए पहले ही खर्च कर दिए हैं," हजरा बताते हैं। उनके अनुसार, सागर द्वीप में आने वाला 84 किलोमीटर तटबंध का हिस्सा पहले ही मज़बूत किया जा चुका है, जबकि और 25 किलोमीटर का कार्य चालू था।

राज्य सरकार के पास सबमर्जड जिओ-ट्यूब तकनीक द्वारा सागर द्वीप के हिस्से में तटीय क्षरण रोकने का दूसरा 77 करोड़ का प्रोजेक्ट है। लेकिन प्रश्न यह उठता है, कि क्या इस तरह के प्रोजेक्ट सचमुच समुद्र को खाड़ी में बाँध रखने में सक्षम होंगे?

प्रायद्वीप जीवंत जमीनी रूप हैं जो लगातार घटते-बढ़ते रहते हैं। जलवायु में बदलाव और समुद्र तल बढ़ने से सुंदरवन प्रायद्वीप के बदलाव और बदतर हो गए हैं। जब आदमी जीविकोपार्जन की खोज में द्वीप समूहों से पलायन करते हैं, और उनके जीवन में अपेक्षाकृत कम अनिश्चितता है, तब औरतें रोजाना ही भूखे ज्वार को उनके घरों के इंच-इंच पास आते देखती हैं।

(भाषांतरण : अंशु श्रीवास्तव)

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