मासिक धर्म स्वच्छता दिवस पर कई शहरों में आयोजित हुए जागरूकता अभियान

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। "पहले माहवारी के मुद्दे पर सिर्फ लड़कियां, लड़कियों से एवं महिलाएं, महिलाओं से बात करती थी लेकिन सरकार एवं समुदाय के प्रयासों से काफी जागरूकता आयी है। इससे इस मुद्दे पर पुरूषों की भागीदारों बढ़ी है। उन्होंने उपस्थित सरकारी अधिकारियों से अपील की कि माहवारी के मुददे पर सभी विभागों को मिलकर काम करना चाहिए," वाटर एड से फारूक खान ने कहा।

फारूक विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस के अवसर पर आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में बात कर रहे थे। वाटर एड के साथ मिलकर ममता, वात्सल्य आदि संस्थाओं ने लखनऊ में मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया। इस कार्यक्रम में कई गांवों की महिलाएं, पुरूष और लड़कियां शामिल हुईं। विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस हर वर्ष 28 मई को मनाया जाता है। वाटर एड संस्था से जुड़ीं श्वेता बताती हैं कि मासिक धर्म की साइकल 28 दिन की होती है और ये औसतन 5 दिन के लिए होता है इसलिए, मासिक धर्म स्वच्छता दिवस 28-05 यानि 28 मई को मनाया जाता है। इसे माहवारी दिवस भी कहा जाता है।


भारत में विश्व मासिक धर्म की शुरूआत वॉश युनाइटेड संस्था ने की थी। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर की लड़कियों एवं महिलाओं को माहवारी के कारण आने वाली चुनौतियों के प्रति जागरूक करना है। इस साल माहवारी दिवस का मुद्दा नो मोर लिमिट्स (No More Limits) है। इसी सोच के साथ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के किशोर स्वास्थ्य अनुभाग में संस्था वाटर एड, वात्सल्य, स्वच्छ भारत मिशन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन आदि के साझा सहयोग से विश्व माहवारी दिवस का आयोजन राजधानी लखनऊ के पंचायती राज निदेशालय के लोहिया सभागार में किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ लखनऊ की महापौर संयुक्ता भाटिया, परिवार कल्याण विभाग की महानिदेशक डॉ. नीना गुप्ता, सहायक शिक्षा निदेशक वरूण, प्लान इंटरनेशनल की चारू शुक्ला एवं सुधीर, जल संस्थान की निदेशक सीमा कुमार एवं वाटर एड के फारूख खान ने किया।

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डॉ. सुंयक्‍ता ने संदेश दिया कि वाटर एड वात्सल्य द्वारा चलाए जा रहे कार्यकमों से उत्तर प्रदेश में काफी असर हुआ है। आज माहवारी स्वच्छता प्रबन्धन को लेकर जागरूकता बढ़ी है। उन्होनें वॉटर एड, वात्सल्य के सहयोग से संचालित कार्यकम में समुदाय स्तर पर उत्कृष्ट कार्य करने वाले प्रतिभागियों को सम्मानित किया। साथ ही उन्होंने यह भी संदेश दिया कि इस मुद्दे पर हम सभी को मिलकर काम करना होगा जिससे हमारा शहर सफाई के मामले में नम्बर एक पर आ जाये।

डा0 नीना गुप्ता किशोरी सुरक्षा योजना मे माहवारी सिर्फ महिलाओं एवं किशोरियों का मुद्दा नहीं है बल्कि इस पर पुरुषों की भागीदारी भी होनी चाहिए। उन्होंने सरकार के द्वारा चलायी जा रही योजनाओं के विषय में बताया जिसमें किशोरियों हेतु स्वास्थ्य क्लीनिक विद्यालयों में साप्ताहिक आयरन गोली, डिवार्मिंग कार्यकम, किशोरी सुरक्षा योजना, पियर एजुकेशन इत्यादि।

कार्यकम में समुदाय स्तर पर माहवारी प्रबन्धन के मुद्दे पर उच्च्तम कार्य करने वाले प्रतिभागियों को वाटर एड का तरफ से मेडल एवं स्मृति चिन्ह देकर पुरस्कृत किया गया। नाइन संस्था को तरफ से सभी प्रतिभागियों को एक पैकेट पैड भी प्रदान किया गया।


कार्यक्रम में लखनऊ की महापौर डॉ. संयुक्ता भाटिया, परिवार कल्याण की निदेशक डॉ. नीना गुप्ता, वाटर एड से फारूक खान एवं अंजली त्रिपाठी, प्लान इंटरनेशनल से चारू शुक्ला, राष्टीय स्वास्थ्य मिशन से एएमडी थमीम अंसारिया, महिला कल्याण आयोग की अध्यक्ष बिमला बाथम, आर. के. एस. के. के महा प्रबन्धक मनोज कुमार शुक्ल, ममता संस्था से डॉ. काजी एवं राजीवगांधी महिला विकास तथा समुदाय से लगभग 500 किशोर स्वच्छता टोली सदस्य किशोरियां, महिलाएं, ग्राम प्रधान आशा कार्यकत्री आंगनवाड़ी कार्यकत्रियां आदि शामिल हुईं।

मुंबई में दसरा संस्था ने इस दिवस के उपलक्ष्य में एक सोशल मीडिया अभियान चलाया। दसरा के अभियान ने माहवारी के बारे में नकारात्मक विचारों को रिसर्च और आकड़ों के ज़रिए गलत ठहराया और विभिन्न सैनेटरी स्वच्छता उत्पादों के बारे में उपलब्ध विकल्पों के बारे में जानकारी दी।

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डॉक्टर अजय खेरा, डिप्टी सेक्रेटरी, स्वास्थ मंत्रालय, भारत सरकार ने कहा, "मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन हमारे लिए महत्वपूर्ण है। किशोर वयीन लड़कियों को एक स्वस्थ जीवन जीने के लिए माहवारी को एक प्राकृतिक प्रकिया मानना चाहिए। इसी वजह से मासिक धर्म स्वछता प्रभंदन सरकार के राष्ट्रीय किशोर स्वस्थ कार्यक्रम का हिस्सा है। ये कार्यक्रम देश भर के स्कूलों में मासिक धर्म स्वछता उत्पादनो को बढ़ोतरी देगा। स्कूलों को एम् यह एम् प्रबंधन का एक अहम् हिस्सा बनाना हमारा लक्ष्य है।"

दसरा संस्था के अनुसार, भारत में लगभग 35.5 करोड़ मासिक धर्म वाली महिलाएं और लड़कियां हैं जो विभिन्न सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति के कारण प्रभाविक रूप से मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (एमएचएम) के लिए बहुस्तरीय बाधाओं का सामना करती हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा दिये गए जानकारियों के अनुसार, भारत में केवल 12% महिलाओं और लड़कियों को ही सैनिटरी नैपकिन के बारे में ज्ञात है, अन्यथा उनमें से अधिकांश मासिक धर्म के दौरान पुरानी, अस्वच्छ तरीकों पर निर्भर हैं।

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