पैसे के खातिर घर से भाग रहे नाबालिग

पैसे के खातिर घर से भाग रहे नाबालिग

गोरखपुर। पिछले कई वर्षों की अपेक्षा अब नाबालिक बच्चो के घर छोड़ कर भागने के मामलो में इजाफा हुआ है। पिछले पांच वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आये है, जहां पुलिस या रेलवे पुलिस ने उन बच्चो को पकड़ कर जिले की चाइल्ड लाइन को सौपा है, जो अपने-अपने घरों से भाग कर कमाने जा रहे थे, लेकिन कभी अकेले न निकलने की वजह से भटक कर अनैतिक कामों में लिप्त थें।

दुखेंद्र (15 वर्ष) पिता का नाम एतवारी, गाँव मुख्तापुर जिला भागलपुर, बिहार का रहने वाला है। दुखेंद्र कहता है, ''मैं अपने गाँव के लोग के साथ भाग कर कमाने छत्तरपुर मध्यप्रदेश गया था, वहां पर मैं मजदूरी करता था। कई दिन काम करने पर ठेकेदार ने कुछ ही पैसे दिए फिर मैं वहां से भाग कर घर जा रहा था तब रेलवे पुलिस ने मुझे पकड़ लिया।"

ऐसा नहीं है की केवल एक ही बच्चे की यही कहानी है गोरखपुर व इससे सटे बिहार के कुछ जिलों के ऐसे कई बच्चे हैं जो आये दिन घर से भाग कर कुछ करने के लिए बाहर तो जाते है, लेकिन ज्यादातर उनका शोषण होता है या फिर वह गलत संगत में फंस जाते है। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्य डॉ. मुमताज कहते है, ''बिहार के अधिकतम बच्चे घर से भाग कर कमाने के लिए बाहर जाते या गोरखपुर आते है या तो स्टेशन पर ही रेलवे पुलिस के द्वारा पकड़े जाते है या फिर बाहर में सिविल पुलिस के द्वारा पकड़े जाने वाले पर इन्हें जेल में न रख कर सुधार केंद्र में रखा जाता है। जहां पर इन्हें रहने खाने-पीने की हर सुविधा का ख्याल रखा जाता है, फिर इन्हें सीडब्लूसी में पेश किया जाता है।" वह आगे बताते है, ''कई बच्चे तो अपने पते को जानते ही नहीं है या बहाना बना कर नहीं जानने का नाटक करते हैं फिर उन्हें हम उनकी काउंसिलिंग कर के जानकारी करते हैं। हमे यह भी ध्यान में रखना होता है की बच्चो के साथ ज्यादा सख्ती न होने पाए।"

क्या है सीडब्लूसी?

डिस्टिक प्रोविजन ऑफिसर समर बहादुर कहते है, ''सीडब्लूसी उन बच्चो के लिए काम करती है जो नाबालिक होते है एवं अपने घर से भाग कर या बिछड़ कर भटक जाते है या तस्करी का शिकार हो जाते हैं जो अपने घर नहीं जा पाते उन बच्चो को सिविल पुलिस, आरपीएफ  या एनजीओ जो सामाजिक कार्य करते है उन्हें पकड़ कर यह जेल में नहीं बल्कि सेल्टर होम को सौपते हैं।" वह आगे बताते है, ''विकलांग या शरीर से अक्षम लोगों को 18 वर्ष से ज्यादा समय तक ही रखने का आदेश है। सामान्य बच्चों के अगर माता-पिता या घर का पता नहीं चलता तो उन्हें हम केवल 18 साल तक ही अपने पास रखते हैं। तब तक हम उन्हें हर तरह की जानकारी पढ़ाई, कंप्यूटर ट्रेनिंग सब देते है।" आगे कहते है, ''हमारे प्रदेश में सुधार केंद्र महिला कल्याण विभाग द्वारा चलाये जाते हैं। जिले में 2005 से अब तक पांच पंजीकृत सेल्टर होम है, इसके अलावा चार सेल्टर होम की पंजीकरण प्रक्रिया चल रही है।"

गोरखपुर जिले में अब तक पिछले पांच सालों में 1282 बच्चों को रेस्क्यू कर के पकड़ा गया है। जिनमें 200 बच्चे शरीर से अक्षम हैं, वो अभी भी हमारे सेल्टर होम में है। कुछ को सुरक्षित उनके घर तक पहुंचा दिया गया।

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