थाक बहादुर के साथ मर गई ‘माझी’

थाक बहादुर के साथ मर गई ‘माझी’gaonconnection

पिछले दिनों सिक्किम राज्य के जोहरेथांग जिले के चौरासी बरस के बुजुर्ग थाक बहादुर माझी के मृत्यु की खबर आई थी, इस खबर के साथ सिक्किम में बोली जाने वाली स्थानीय भाषा ‘माझी’ का भी अंत हो गया क्योंकि इस स्थानीय बोली के आखिरी जानकार थाक बहादुर ही थे। हो सकता है लोगों के लिए ये बात महज एक खबर बनकर आई हो, चली भी गई हो लेकिन भाषाओं और बोलियों को बचाने की कवायद में जुटे अनेक लोगों के लिए ये बेहद दुखदायी खबर साबित हुई।

बोलियों और भाषाओं के विलुप्त होने की बात नई नहीं है लेकिन तकलीफ की बात ये है कि इन विलुप्तप्राय: भाषाओं और बोलियों को बचाने स्थानीय युवा आगे नहीं आ रहा। चाहे उत्तर पूर्वी राज्यों की बात हो, मध्यभारत की बात हो या दक्षिण भारत, वनवासी इलाकों में भाषाओं का विलुप्तीकरण ज्यादा हुआ है।

वनवासी समाज के युवाओं को उनकी संस्कृति, रहन-सहन, पारंपरिक ज्ञान और पर्यावरण सरंक्षण संबंधित बुजुर्गों के अनुभवों की महत्ता बताई जाना जरूरी है क्योंकि अब ज्यादातर युवा पलायन का शिकार हो चुका है। 

युवाओं के पलायन को रोककर गाँवों में ही रोजगार के अवसर प्रदान कराए जाएं ताकि गाँवों की सूरत जरूर बदले लेकिन आत्मा और शरीर वही रहे। पलायन करके गाँव का नौजवान जब शहर पहुंचता है और शहर की चकाचौंध रौशनी और रफ्तार में पहुँच जाता है तो उसे लगता है कि देहाती भाषा बोलने पर उसका मजाक उड़ाया जाएगा।

विकास की ये कैसी दौड़ जिसमें हम खुद अपने पैरों के तले गड्ढा खोदने पर आतुर हैं? शहरीकरण होने की वजह से दुनियाभर की 6000 बोलियों में से आधे से ज्यादा खत्म हो चुकी हैं क्योंकि अब उसे कोई आम बोलचाल में लाता ही नहीं है, कुल मिलाकर भाषा या बोली की मृत्यु हो जाती है।

एक भाषा की मृत्यु या खो जाने से भाषा से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान भी खत्म हो जाता है। लोक भाषाओं और बोलियों के खो जाने का नुकसान सिर्फ वनवासियों को नहीं होगा बल्कि सारी मानव प्रजाति एक बोली के खो जाने से उस बोली या भाषा से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को खो देती है। आज भी दुनियाभर के तमाम संग्रहालयों में क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों से जुड़े अनेक दस्तावेज धूल खा रहे हैं और ना जाने कितनी दुलर्भ जानकारियां समेटे ये दस्तावेज अब सिवाय नाम के कुछ नहीं।

ब्राजील की ऐसी एक विलुप्त प्राय: जनजाति से प्राप्त जानकारियों से जुड़े कुछ दस्तावेजों पर वर्षों तक शोध किया गया और पाया गया कि ये आदिवासी समुद्री तूफान आने की जानकारी 47 घंटे पहले ही कर दिया करते थे और ठीक इसी जानकारी को आधार मानकर आधुनिक विज्ञान की मदद से ऐसे संयंत्र बनाए गए जो प्राकृतिक आपदाओं की जानकारी समय से पहले दे देते हैं।

पारंपरिक ज्ञान को आधार मानकर सारे मानव समुदाय और समाज के लिए नई शोध और नवप्रवर्तन को तैयार करना, पारंपरिक ज्ञान का सम्मान है।

पारंपरिक ज्ञान का असल कलेवर स्थानीय बोलचाल में ही दिखाई देखा है। मध्यप्रदेश के पातालकोट जैसे समृद्ध आदिवासी इलाकों में तो पारंपरिक ज्ञान समाज का मूल हिस्सा है लेकिन ना सिर्फ पातालकोट बल्कि दुनियाभर में आज विकास के नाम पर जो दौड़ लगाई जा रही है, इस बात का पूरा डर है कि अनेक जनजातियों के बीच चला आ रहा पारंपरिक ज्ञान कहीं विकास की चपेट में आकर खो ना जाए।

मैं विकास का विरोधी नहीं हूं, विकास होना जरूरी है लेकिन विकास होने से पहले ये भी तो तय हो कि विकास किसका होना है और किस हद तक होना है। 

अब तक आदिवासियों का विकास होने के बजाए उनका रूपान्तरण होता आया है। विकास तो हो लेकिन आदिवासियों का रूपांतरण ना हो, उनकी संस्कृति, संस्कारों, रहन-सहन, खान-पान, ज्ञान और स्थानीय भाषा या बोली को बचाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी भी इनके ज्ञान से नवसृजन करके मानव हित के लिए नए उत्पाद, नए सुलभ उपाय और पारंपरिक ज्ञान की मदद से पर्यावरण को सजाएं, मानव जीवन को सजाए और भाषाएं, बोलियां जिंदा रहे। 

(लेखक हर्बल जानकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।) 

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