जो अंत तक हमारे साथ चलता है, वो संगीत है : चंद्रलेखा त्रिपाठी (8 मई, 1941- 26 दिसंबर, 2021)

राष्ट्रपति के हाथों से राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली चांद दीदी की आवाज आज भले ही खामोश हो गई हो लेकिन उनकी संगीत विरासत अभी भी मसूरी में गूंजती है। यहां उन्होंने 38 सालों से ज्यादा समय तक युवा छात्रों को फ्री में संगीत सिखाया है।

हर कोई उन्हें चांद दीदी के नाम से जानता था। मसूरी में लोग उनकी आवाज के कायल थे। लेकिन उनकी ये आवाज 26 दिसंबर को खामोश हो गई। चंद्रलेखा त्रिपाठी ने उत्तराखंड के मसूरी में अंतिम सांस ली थी।

80 साल की चांद दीदी मसूरी में ही पैदा हुई, वहीं उन्होंने अपनी पढ़ाई की और फिर गर्ल्स इंटर कॉलेज मसूरी में लेक्चरर बन गईं। लगभग 38 सालों तक उन्होंने कॉलेज में रहकर बच्चों को संगीत की शिक्षा दी। रिटायर होने के बाद वह छात्रों को फ्री में अपने घर पर संगीत सिखाने लगीं। उनका ये घर मसूरी की पहाड़ियों में संगीत का केंद्र था क्योंकि दूर-दूर से युवा उनसे संगीत सीखने के लिए आते थे।

चांद दीदी के छात्र, आज भी तबला वादन करते हुए उनकी छवि को याद करते है, जहां वे उनके सामने नाचते और गाते थे। या फिर उनके उस रूप को याद करते हैं जहां वह अपनी छत पर खड़े होकर, अपने कुत्ते के साथ, घाटियों और पहाड़ियों को टकटकी लगाकर देख करती थीं। वहां खड़े होकर अक्सर ये योजना बनाती थीं कि आज वह अपने इन युवा दोस्तों को क्या सिखाएंगी।


गांव कनेक्शन के 'द पीपल प्रोजेक्ट' के लिए हमने कुछ समय पहले चांद दीदी और उनके छात्रों से मुलाकात की थी। यह प्रोग्राम हमारे बीच के नायकों के जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को सामने लेकर आता है।

उनकी एक छात्रा अंशुका तायल कहती हैं, ''हमने संगीत के अलावा भी बहुत कुछ सीखा। वह आगे कहती हैं, " पहले मैं किसी से बात करने में भी शर्माती थी। लेकिन चांद दीदी में मैंने खुलकर बोलना सीखा और मेरे अंदर एक आत्मविश्वास भी आ गया।"

जब चांद दीदी अपनी नौकरी से रिटायर हुई, तो उन्होंने अपने घर पर बच्चों को संगीत सिखाना शुरू कर दिया। लेकिन इसके लिए वह किसी से कोई पैसा नहीं लेती थी।


चांद दीदी ने मुस्कुराते हुए गांव कनेक्शन को बताया था, "मैं नहीं चाहती थी कि मेरे किसी भी छात्र को यह बुरा लगे कि वह फीस नहीं दे सकता है। इसलिए उनकी आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना, मैंने सभी को फ्री में संगीत सिखाया।" राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता (2001) ने कहा था, "ये बच्चे मुझे ऊर्जा देते हैं।"

चांद दीदी ने हसंते हुए कहा था, "मुझे हमेशा से गाने में मजा आता था और मैं माइक को लेकर काफी रोमांचित हुआ करती थी। मुझे याद है, बचपन में, मैं घर पर अपने मुंह में एक गिलास पकड़कर गाना गाती थी, मानो वो एक माइक हो। " उन्हें बचपन में जवाहरलाल नेहरू के सामने भी गाना गाया था। वह आगे कहती हैं, "संगीत अंत तक आपका साथी बना रहता है।"

चांद दीदी का अंतिम संस्कार हरिद्वार में किया ग या। वह अपने पीछे अपनी आवाज, अपने संगीत, अपने समर्पण और निस्वार्थ प्रतिबद्धता को छोड़ कर गई हैं। उनके कई शिष्य, जिनके लिए वह एक प्रिय गुरु थीं, उनकी विरासत को आगे बढ़ाते हुए, युवा छात्रों को संगीत सिखा रहे हैं।

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