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चढ़ते सूरज के पूजारी तो लाखों हैं 'फ़राज़', डूबते वक़्त हमने सूरज को भी तन्हा देखा...

अहमद फ़राज़ एक ऐसे शायर थे, जिन्हें भारत-पाकिस्तान की सरहदें भी न रोक पाईं, दोनों देशों में उनके हज़ारों चाहने वाले थे और आज भी हैं।

Divendra SinghDivendra Singh   12 Jan 2019 8:12 AM GMT

चढ़ते सूरज के पूजारी तो लाखों हैं

अहमद फ़राज़ एक ऐसा शायर जिसने जो लिखा लोगों की जुबान पर छा गया। रूमानी और विरोधी कविताओं के लिए मशहूर शायर अहमद फ़राज़ ने आज ही के दिन इस दुनिया को अलविदा किया था, लेकिन आज भी अपनी शेरों-शायरियों से लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं।

अहमद फ़राज़ एक ऐसे शायर थे, जिन्हें भारत-पाकिस्तान की सरहदें भी न रोक पाईं, दोनों देशों में उनके हज़ारों चाहने वाले थे और आज भी हैं।


अहमद फ़राज़ 12 जनवरी 1931 को कोहाट के एक प्रतिष्ठित सादात परिवार में पैदा हुए उनका असल नाम सैयद अहमद शाह था। अहमद फ़राज़ ने अपना कैरियर रेडियो पाकिस्तान पेशावर में स्क्रिप्ट राइटर के रूप में शुरू किया मगर बाद में वह पेशावर यूनिवर्सिटी में उर्दू के उस्ताद नियुक्त हो गये। 1974 में जब पाकिस्तान सरकार ने एकेडमी आफ़ लेटर्स के नाम से देश की सर्वोच्च साहित्य संस्था स्थापित की तो अहमद फ़राज़ उसके पहले डायरेक्टर जनरल बनाये गये।

जब बात उर्दू ग़ज़ल की परम्परा की हो रही होती है तो हमें मीर तक़ी मीर, ग़ालिब आदि की चर्चा ज़रूर करनी होती है। मगर बीसवीं शताब्दी में ग़ज़ल की चर्चा हो और विशेष रूप से 1947 के बाद की उर्दू ग़ज़ल का ज़िक्र हो तो उसके गेसू संवारने वालों में जो नाम लिए जाएंगे उनमें अहमद फ़राज़ का नाम कई पहलुओं से महत्त्वपूर्ण है।

अहमद 'फ़राज़' ग़ज़ल के ऐसे शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल को जनता में लोकप्रिय बनाने का क़ाबिले-तारीफ़ काम किया। ग़ज़ल यों तो अपने कई सौ सालों के इतिहास में अधिकतर जनता में रुचि का माध्यम बनी रही है, मगर अहमद फ़राज़ तक आते-आते उर्दू ग़ज़ल ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे और जब फ़राज़ ने अपने कलाम के साथ सामने आए, तो लोगों को उनसे उम्मीदें बढ़ीं। ख़ुशी यह कि 'फ़राज़' ने मायूस नहीं किया।

अपनी विशेष शैली और शब्दावली के साँचे में ढाल कर जो ग़ज़ल उन्होंने पेश की वह जनता की धड़कन बन गई और ज़माने का हाल बताने के लिए आईना बन गई। मुशायरों ने अपने कलाम और अपने संग्रहों के माध्यम से अहमद फ़राज़ ने कम समय में वह ख्याति अर्जित कर ली जो बहुत कम शायरों को नसीब होती है। बल्कि अगर ये कहा जाए तो गलत न होगा कि इक़बाल के बाद पूरी बीसवीं शताब्दी में केवल फ़ैज और फ़िराक का नाम आता है जिन्हें शोहरत की बुलन्दियां नसीब रहीं, बाकी कोई शायर अहमद फ़राज़ जैसी शोहरत हासिल करने में कामयाब नहीं हो पाया। उसकी शायरी जितनी ख़ूबसूरत है, उनके व्यक्तित्व का रखरखाव उससे कम ख़ूबसूरत नहीं रहा।

1) किताबों में मेरे फ़साने ढूंढते हैं,

नादां हैं गुज़रे ज़माने ढूंढते हैं।

जब वो थे तलाशे-ज़िंदगी भी थी,

अब तो मौत के ठिकाने ढूंढते हैं।

कल ख़ुद ही अपनी महफ़िल से निकाला था,

आज हुए से दीवाने ढूंढते हैं।

मुसाफ़िर बे-ख़बर हैं तेरी आंखों से,

तेरे शहर में मैख़ाने ढूँढते हैं।

तुझे क्या पता ऐ सितम ढाने वाले,

हम तो रोने के बहाने ढूंढते हैं।

उनकी आंखों को यूं ना देखो 'फ़राज़',

नए तीर हैं, निशाने ढूंढते हैं।


2) ज़िन्दगी यूं थी कि जीने का बहाना तू था,

हम फ़क़त जेबे-हिकायत थे फ़साना तू था

हमने जिस जिस को भी चाहा तेरे हिज्रां में वो लोग

आते जाते हुए मौसम थे ज़माना तू था

अबके कुछ दिल ही ना माना क पलट कर आते

वरना हम दरबदरों का तो ठिकाना तू था

यार अगियार कि हाथों में कमानें थी फ़राज़

और सब देख रहे थे कि निशाना तू था


3) ग़ज़ल सुन के परेशां हो गए क्या,

किसी के ध्यान में तुम खो गए क्या,

ये बेगाना-रवी पहले नहीं थी,

कहो तुम भी किसी के हो गए क्या,

ना पुरसीश को ना समझाने को आए,

हमारे यार हम को रो गए क्या,

अभी कुछ देर पहले तक यहीं थी,

ज़माना हो गया तुमको गए क्या,

किसी ताज़ा रफ़ाक़त की ललक है,

पुराने ज़ख़्म अच्छे हो गए क्या,

पलट कर चाराग़र क्यों आ गए हैं,

शबे-फ़ुर्क़त के मारे सो गए क्या,

'फ़राज़' इतना ना इतरा होसले पर,

उसे भूले ज़माने हो गए क्या,


4) रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख

तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

पहले से मरासिम न सही, फिर भी कभी तो

रस्मों-रहे दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएंगे जुदाई का सबब हम

तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

इक उम्र से हूं लज़्ज़त-ए-गिरिया से भी महरूम

ऐ राहत-ए-जां मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें

ये आखिरी शमएं भी बुझाने के लिए आ


5) जो भी दुख याद न था याद आया

आज क्या जानिए क्या याद आया

फिर कोई हाथ है दिल पर जैसे

फिर तेरा अहदे-वफ़ा याद आया

जिस तरह धुंध में लिपटे हुए फूल

एक-इक नक़्श तिरा याद आया

ऐसी मजबूरी के आलम में कोई

याद आया भी तो क्या याद आया

ऐ रफ़ीक़ो! सरे-मंज़िल जाकर

क्या कोई आबला-पा याद आया

याद आया था बिछड़ना तेरा

फिर नहीं याद कि क्या याद आया

जब कोई ज़ख़्म भरा दाग़ बना

जब कोई भूल गया याद आया

ये मुहब्बत भी है क्या रोग 'फ़राज़'

जिसको भूले वो सदा याद आया


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