ट्रैफिक स्कूल है ये पुलिसवाला

ट्रैफिक स्कूल है ये पुलिसवालाgaoconnection

लखनऊ। टेढ़ी पुलिया के पास एक संकरी गली ऐसे शख्स के घर ले जाती है जो है तो पुलिस का एक सिपाही लेकिन लोग उसे दूसरी वजह से जानते हैं। किराए के घर में रहने वाला वो शख्स गाँव-गाँव, शहर-शहर जाकर नयी पीढी को यातायात के नियमों के बारे में रोचक तरीकों  से जानकारी देता है। उत्तर प्रदेश में आरक्षी (कोंस्टेबल) के पद पर कार्यरत भूप सिंह यादव नाम के इस शख्स को पुलिस डिपार्टमेंट में लोग ‘मास्टर साहब’ के नाम से भी जानते हैं।

भारत में हर चार मिनट में एक शख्स सड़क हादसे में मारा जाता है। हर रोज ऐसे करीब 377 लोग सड़क हादसों की भेंट चढ़ जाते हैं। उत्तर प्रदेश सड़क हादसों के मामले में सबसे आगे है। यहां हर घंटे में दो लोग सड़क हादसे की चपेट में आकर मारे जाते हैं। ये भयावह आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में लोग सड़क के नियमों को लेकर कितने लापरवाह हैं। बीते सत्रह सालों से इस लापरवाही की बड़ी खाई को पाटने का काम भूप सिंह अकेले दम पर पूरी लगन से कर रहे हैं। 

भूप सिंह बताते हैं कि वो अब तक करीब एक हज़ार स्कूलों में जाकर तकरीबन पांच लाख बच्चों और बड़ों को यातायात के नियमों के बारे में बता चुके हैं। “बच्चों को इसकी कोई जानकारी ही नहीं देता है कि सड़क पर कैसे चलना है और इसकी वजह से न जाने कितने लोग हादसों में अपनी जान गंवा देते हैं।

जो चीज़ हमें उन्हें सबसे पहले सिखानी चाहिए वो ये है कि हमें सड़क पर सुरक्षित कैसे रहना है। बिना सुरक्षित रहे हम देश का भविष्य कैसे बना सकते हैं,” वो बताते हैं।

बच्चों को यातायात के नियमों की जानकारी देने का ख़याल कैसे आया इस बारे में पूछने पर भूप सिंह कहते हैं, “नौकरी के शुरुआती वक्त में जब मैं कन्नौज में था तो मैंने एक दर्दनाक हादसा अपनी आंखों के सामने देखा। उसके बाद ऐसे कई हादसे हुए। अकेले कन्नौज में मैंने सड़क दुर्घटनाओं में मरे दस से ज़्यादा लोगों का पोस्टमार्टम कराया। ये देखकर बहुत दुःख होता था कि किसी परिवार ने एक कमाने वाला खो दिया, किसी ने अपनी मां को खो दिया। केवल इसलिए क्योंकि किसी दूसरे ने असावधानी से गाड़ी चलाई”।

सन 2000 में नवम्बर के महीने में पहली बार भूप सिंह अपनी प्रेरणा से एक स्कूल में गए और उन्होंने कहा कि वो बच्चों को यातायात के बारे में बताना चाहते हैं। उन्होंने करीब दो घंटे तक बच्चों को भाषण दिया जिसमें उन्होंने बताया कि सड़क पर चलने के नियम क्या हैं। “बच्चों को मेरा भाषण अच्छा लगा और मेरा हौसला बढ़ गया। इसके बाद मैंने अपने भाषण को और रोचक बनाने की कोशिश की। मैं और भी स्कूलों में गया और हास्य का पुट देते हुए मैंने बच्चों को सड़क पर बरती जाने वाली ज़रूरी सावधानियों के बारे में जागरूक किया”।

जनवरी 2001 को भूप सिंह पूरे एक महीने की छुट्टी लेकर एक साइकिल यात्रा पर निकल गए। इस यात्रा में वो सैकड़ों स्कूलों में गए। “मेरे अधिकारियों को जब ये पता चला कि मैं क्यों छुट्टी पर जा रहा हूं, उन्होंने मुझसे कहा कि तुम ये काम ड्यूटी के टाइम भी कर सकते हो। लेकिन मैं चाहता था कि मेरे इस काम में कोई रुकावट न हो और मैं अपने डिपार्टमेंट के लिए भी ईमानदारी से काम कर सकूं। बाद में डिपार्टमेंट ने मुझे बहुत सहयोग दिया” भूप सिंह ये बताते हुए खुश नज़र आते हैं।   

 देश ने आम आदमी से लेकर बड़े-बड़े राजनेताओं और महत्वपूर्ण लोगों को सड़क हादसों में खोया है। “आज़ादी के बाद उतने सैनिक शहीद नहीं हुए होंगे जितने लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए। यातायात को लेकर हमारे देश में सबका रवैय्या बहुत लचर है। 

ड्राइविंग लाइसेंस तक घूसखोरी के बिना मुश्किल से बनता है। लोगों को समझ नहीं आता की बिना गाड़ी चलाना सीखे वो ड्राइविंग का नहीं अपनी मौत का लाइसेंस ले रहे हैं” भूप सिंह कहते हैं। भूप सिंह को अब तक पुलिस के बड़े अधिकारियों से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक यातायात को लेकर उनके समर्पण के लिए सैकड़ों बार सम्मानित कर चुके हैं। कई बार उनका नागरिक अभिनन्दन भी किया गया है। “छोटे पद पर हूं तो क्या हुआ देश की सेवा पद से नहीं दिल से की जाती है” भूप सिंह ये कहते हुए गर्व से मुस्कुरा देते हैं। आज के समय में जहां पुलिस की छवि पर लोग कई सवाल खड़े करते हैं वहां भूप सिंह यादव सरीखे लोग एक उम्मीद ज़रूर जगाते हैं। स्वप्रेरणा से बिना किसी स्वार्थ के चल रहे उनके इस अनूठे जागरूकता अभियान से अगर सड़क पर कुछ जानें भी बच पाती हैं तो ये बहुत बड़ी बात है।

रिपोर्टर - उमेश पंत

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