उद्योगों से भेदभाव न होता तो हज़ारों करोड़ कमाता बुंदेलखंड

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अस्सी के दशक से लेकर नब्बे के दशक के अंत तक, जब देश में अर्थव्यवस्था से जुड़े नियमों में हुए बदलावों के चलते उद्योगों में नई ऊर्जा आ रही थी, और उद्योग प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाने के साथ ही देश के विकास को धक्का दे रहे थे, उस समय भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस औद्योगिक विकास की धारा में शामिल नहीं हो पाया, बहुत पीछे छूट गया। वो था बुंदेलखण्ड। 

जानकारों के मुताबिक उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 ज़िलों को मिलाकर बने बुंदेलखंड में यदि औद्योगिक विकास पर ध्यान दिया जाता तो यह क्षेत्र आज दोनों राज्यों को हजारों करोड़ रुपये कमा कर दे रहा होता। 

“बुंदेलखंड में उद्योगों को लगाने के लिए कदम ही नहीं उठाए गए वरना संभावनाएं इतनी हैं कि ये क्षेत्र हज़ारों करोड़ अगले कुछ सालों में कमा कर दे सकता है,” उद्योगों के संगठन फिक्की-यूपी के राज्य परिषद के चेयरमैन एलके झुनझुनवाला ने गाँव कनेक्शन से कहा, “सबसे पहली आवश्यकता वो करने की है जो आज तक नहीं किया गया, एक सर्वे। सर्वे से ये तो पता चले कि पक्की-पक्की संभावनाएं हैं क्या क्षेत्र में?”

श्रीलंका से भी ज्यादा 70 हज़ार वर्ग किमी की ज़मीन वाला और 15 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाला बुंदेलखण्ड दो तरह के सूखे का सामना कर रहा है। एक सूखा खेती की त्रासदी से जुड़ा है, दूसरा, सरकारों की उपेक्षा के कारण पनपी उद्योगों की कमी के चलते पैदा हुआ रोज़गार का सूखा है।

भौगोलिक स्थिति के हिसाब से खेती करने के लिए देश की सबसे विषम जगहों में से एक होने के बावजूद बीते कई दशकों से बुंदेलखण्ड में 75-80 प्रतिशत लोगों की कमाई का अकेला ज़रिए खेती ही है। इससे कृषि त्रासदी यहां की जनसंख्या को भूख और कर्ज़ के कुचक्र में जीने को धकेल देती है। 

मनरेगा जैसी श्रम की सरकारी योजनाएं मदद तो करती हैं लेकिन सीमित समय तक। इन योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार मजदूरों की उम्मीदों को और तोड़ देता है। सूखे के चलते खेती न होने और मजदूरी के अवसर भी सिमट जाने के कारण यहां के शारीरिक रूप से सक्षम लोग तो रोज़गार के लिए पलायन कर जाते हैं लेकिन जो नहीं जा पाते वो फाख्ते में जीने को मजबूर हो जाते हैं। खाना-राशन वितरण जैसी सरकारी योजनाएं भूख से बचा सकती हैं लेकिन जीवन नहीं सुधार सकतीं।

“उत्तर-पूर्वी राज्यों में उद्योगों को आकर्षित करने के लिए एक्साइज़ ड्यूटी खत्म कर दी गई है। उत्तराखंड जब बना तब बिजली, आधारभूत ढांचों के निर्माण, आयात-निर्यात व एक्साइज़ ड्यूटी सब पर सब्सिडी दी गई थी। ऐसी सुविधाएं अगर बुंदेलखंड में देते तो इंडस्ट्री भाग कर पहुंचती। लेकिन सरकारों ने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया,” बुंदेलखंड में उद्योगों की कमी के कारण बताते हुए झुनझुनवाला ने कहा।

आज़ादी के बाद से वर्ष 2008 तक बुंदेलखंड ने सिर्फ दो बड़े उद्योग पाए। वर्ष 1970 में झांसी में भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स की स्थापना हुई और एमपी-दामोह में 80 के दशक में बिड़ला की सीमेंट फैक्ट्री स्थापित हुई। 

झुनझुनवाला के अनुसार पानी की कमी के चलते पहले ही पानी इस्तेमाल करने वाले उद्योग वहां नहीं जाएंगे लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि वहां उद्योगों के अवसर नहीं हो सकते थे। उन्होंने कहा, “अब ऐसे में सोचना होगा कि वहां कौन सा उद्योग सफल हो सकता है। मैं आपको बता दूं, बुंदेलखंड में सौर ऊर्जा उत्पादन की बहुत संभावनाएं हैं। एक बार बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा का उत्पादन अगर शुरू हो गया, तो ऊर्जा पर आधारित सारे उद्योग सस्ती बिजली के लालच में वहां भागेंगे।”

उन्होंने आगे कहा, “वहां कपड़ों की सिलाई, चश्मा और घड़ियां बनाने की फैक्ट्री लग जाएंगी, उसके लिए कौन सा कच्चा माल क्षेत्र से ही चाहिए होगा, और बाहर से कच्चा माल लाने के लिए ट्रांसपोर्ट का खर्च होगा तो वो थोक में वैसे भी कम होता है। अगर रियायतें दे दें तो बाकी की दिक्कतें उद्योग खुद दूर कर लेंगे”।

खेती के बाद बुंदेलखंड के लोगों के रोज़गार का सबसे बड़ा ज़रिया यहां का बीड़ी उद्योग है। ‘बुंदेलखंड इंफो’ नामक फोरम के एक सर्वे के अनुसार क्षेत्र के लगभग दो लाख लोग इस उद्योग से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। एमपी-बुंदेलखंड का तो एक चौथाई कार्यबल केवल इसी उद्योग से रोज़गार पाता है। रोज़गार का दूसरा सबसे बड़ा ज़रिया रेलवे है जो झांसी व आस-पास 10 हज़ार से ज्यादा लोगों को रोज़गार देता है। इन सब के अलावा वैध-अवैध खनन उद्योग भी बुंदेलखंड के कुछ जिलों में रोज़गार के सीमित अवसर उपलब्ध कराता है। 

वहीं, प्रदेश में उद्योगों के एक अन्य बड़े संगठन ‘एसोचैम-यूपी’ के अध्यक्ष शैलेन्द्र जैन की मानें तो बड़े उद्योगों के साथ-साथ बुंदेलखंड में मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्योगों की भी आवश्कता है, जो क्षेत्र को रोज़गार संजोने की अवसरों का अतिरिक्त आयाम उपलब्ध कराएगी। 

“हाल ही में मैं बुंदेलखंड चेम्बर ऑफ कॉमर्स की मीटिंग में गया था। मैंने उनसे कहा कि आप लोग हमेशा ये कहते रहते हो कि हमारे यहां माइनिंग और स्टोन का जो मुख्य काम है उसमें कमी आ रही है। लेकिन आप लोग कभी बुंदेलखंड में छोटे-छोटे उद्योगों की संभावनाओं को नहीं तलाशते। मैंने उनसे ये तक कहा कि अगरबत्ती ही बनाना शुरू करवाओ यहां, जिसकी रोज़ की खपत है। ट्रेनिंग के लिए लोग हम भेजेंगे,” शैलेंद्र आगे कहते हैं, “यहां का हस्तशिल्प में चंदेरी आता है उसे विकसित करो, क्षेत्र की आवश्यकताओं को देखते हुए अन्य छोटे-छोटे उद्योग लगाओ”।

बुंदेलखंड के औद्योगिक क्षेत्र के सिमटे होने के पीछे सरकारों की नीतियों में इस क्षेत्र को उपेक्षित रखना भी मुख्य कारण रहा है। उदाहरण के तौर पर अगर सिर्फ यूपी-बुंदेलखंड की बात करें तो ‘बुंदेलखंड इंफो’ के ही सर्वे के अनुसार वर्ष 2010 तक प्रदेश के अन्य क्षेत्रों के मुकाबले यूपी-बुंदेलखंड की फैक्ट्रियों को विकसित करने के लिए महज़ दो फीसदी वित्तीय निवेश आया। मध्य यूपी और पिछड़े माने जाने वाले पूर्वी यूपी में इसका दोगुना निवेश किया गया। वहीं अकेले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में औद्योगिक विकास के लिए 60 फीसदी निवेश हुआ। 

हालांकि कानपुर से लेकर झांसी तक एक औद्योगिक कॉरीडोर धुंधली तस्वीर लिए उभर रहा है। लेकिन बाकी का बुंदेलखंड अभी भी इस विकास से अछूता है।

उद्योगों के लिए यूपी-एमपी की योजनाएं

यूपी सरकार उद्योगों का केंद्र बनकर उभर रहे झांसी में नए निवेश को लाने के साथ-साथ यूपी-बुंदेलखंड के कुछ ज़िलों को सौर ऊर्जा उत्पादन का केंद्र बनाने की ओर काम कर रही है। क्षेत्र में दलहन और तिलहन की संभावनाओं को देखते हुए इन उत्पादों के प्रोसेसिंग की फैक्टि्रयां स्थापित करने की भी योजना है। वहीं, एमपी के बुंदेलखंड में सरकार सीमेंट, खनिज, बिजली, स्टील आदि के प्लांट स्थापित करने की ओर काम कर रही है। एमपी ने इन अवसरों को तलाशने की कवायद वर्ष 2005 से ही शुरू कर दी थी। वर्ष 2008 तक एमपी ने कई इकाईयों को स्थापित करने के सहमति पत्र भी साइन कर लिए थे।

सिर्फ बुंदेलखंड में है शज़र पत्थर, लेकिन कद्र नहीं

अरविन्द शुक्ला

बांदा। दुनिया में अपनी तरह का सबसे खास पत्थर शज़र, सिर्फ बुंदेलखंड में पाया जाता है और बांदा में ही इसकी नक्काशी होती है। यहां के कारीगर शज़र पत्थर पर नक्काशी कर राष्ट्रपति से पुरस्कार भी पा चुके हैं लेकिन न तो इस कला को बढ़ावा दिया और न ही इस कारोबार को तवज्जो मिली, जो कारीगर काम कर भी रहे हैं वो अपने बल पर।

बांदा में बलखंडी नाके के पास शज़र पत्थर के कारीगर और कारोबारी द्वारिका प्रसाद सोनी को हस्तशिल्प में राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। ज्वैलरी के साथ इसकी कलाकृतियां भी काफी अच्छी कीमत में बिकती हैं। सोनी समेत बांदा में इस कारोबार से करीब 200 लोग जुड़े हैं। अपनी कलाकृतियां दिखाते हुए सोनी बताते हैं, ये पत्थर बांदा के अलावा थोड़ा बहुत एमपी की नर्मदा नदी में मिलता है, लेकिन इसकी कटाई सिर्फ बांदा में होती है। समस्या बेचने की है, अगर सरकार इस ओर ध्यान देती तो हजारों लोग रोजगार पा सकते थे। अभी सिर्फ जयपुर जाकर बेचते हैं या कोई खरीददार यहीं आ जाए। अगर ताजमहल के बाहर, लखनऊ हॉट आदि में दुकाने अलॉट की जाती तो ये इसे अपने आप मार्केट मिल जाती लेकिन ऐसा हुआ नहीं।”

द्वारिका प्रसाद सोनी बुंदेलखंड में उद्योग की तरफ सरकार की उदासीनता की तरफ इशारा कर रहे थे, जिससे आज तक यहां कोई उद्योग पनप नहीं पाया। बांदा के जिला उद्योग विभाग में करीब 28 कर्माचारी हैं लेकिन इंड्रस्ट्री 25 भी नहीं। विभाग के अपर साख्यिकी अधिकारी एसके सूर्यवंशी बताते हैं, उद्योग शून्य जिला है। 20-22 छोटे कारखाने होंगे जिले में जिनमें ब्रेड प्लांट, फ्लोर मिल और आयल स्पेलर वगैरह हैं। बड़े उद्योगों के लिए कभी इंड्रस्ट्री ने इधर रुख ही नहीं किया।”

जिले में उद्योगों लाने के लिए प्रयास में जुटे बांदा के जिलाधिकारी योगेश कुमार कहते हैं, “बुंदेलखंड की खुशहाली के लिए खेती से निर्भरता कम करनी होगी। हमारी कई कंपनियों से बात चल रही है जो यहां रुचि ले रही हैं। फिलहाल हम लोग इंडिया मार्का हैंडपंप और पानी के टैंकर की मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट शुरू कर रहे हैं। इंडियन आयल समेत के बाटलिंग प्लांट के लिए भी बात जारी है।”

“बुंदेलखंड में उद्योग का न पनपना एक सोची समझी साजिश जैसी है। पूरे यूपी के औद्योगिक निवेश की बात करें तो 58 फीसदी पश्चिमी यूपी, लखनऊ-रायबरेली समेत मध्य यूपी में 24, पूर्वाचंल में 16 फीसदी निवेश हुआ है जबकि बुंदेलखंड के सात जिलों में सिर्फ 2 दो फीसदी। आखिर यहां पर कमी किस चीज की थी, जो उद्योग लगाए नहीं जा सके।” बुंदेलखंड के आरटीआई और सामाजिक कार्यकर्ता नसीह अहमद सिद्दीकी सवाल करते हैं।

अपनी बात को जारी रखते हुए वो कहते हैं, “उद्योगों के लिए चाहिए सस्ती जमीन, सस्ता मजदूर जो यहां हैं। बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा गैर उपयोगी जमीन है। रोजगार की कमी के चलते सबसे सस्ता लेबर भी है। पूरे बुंदेलखंड में बेहतर रेल नेटवर्क है इतना नहीं ललितपुर और झांसी में जितनी बिजली बनती है, उससे पूरे बुंदेलखंड के लिए प्रचुर बिजली है लेकिन किसी ने पहल ही नहीं की।” 

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