मनरेगा के लिए 48 हजार करोड़: “बजट तभी अच्छा है जब गाँव तक पहुंचे”

मनरेगा के लिए 48 हजार करोड़:  “बजट तभी अच्छा है जब गाँव तक पहुंचे”विश्वबैंक ने मनरेगा को दुनिया की सबसे बड़ी ग्रामीण विकास की परियोजनाओँं में एक बताया था।

गत वर्ष मनरेगा के तहत 47 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस बार 48 हजार करोड़ रुपये का बजट तैयार किया गया है। इस साल भी पांच लाख तालाब का लक्ष्य रखा गया है। हम नीतिगत प्रशासन की ओर बढ़े हैं। हमारा फोकस एक करोड़ परिवारों को गरीबी से बाहर लाना है।
अरुण जेटली, वित्तमंत्री

लखनऊ/बाराबंकी/कन्नौज/कानपुर। मनरेगा भारत में रोजगार का बड़ा जरिया। करोड़ों लोगों को प्रतिवर्ष इससे रोजगार मिलता है। गांव से पलायन रोकने में भी एक हद तक सहायक हुई है, हालांकि पिछले महीनों में लगातार फंड मिलने में देरी से लोगों का मोंह भी भंग हुआ है, पढ़िए इस पर प्रधान और मजदूर क्या कहते हैं।

वित्तमंत्री अरुण जेटली साल 2017-18 के बजट में मनरेगा के लिए आवंटन 11 हजार करोड़ रुपए का इजाफा करते हुए इसे 48 हजार करोड़ रुपए कर दिया है। पिछले साल 2016-17 में मनरेगा का बजट आवंटन 38 हजार करोड़ रुपए था। मनरेगा योजना के 11 साल के इतिहास में सबसे ज्यादा आवंटन है। मनरेगा में महिलाओं की भी भागेदारी में 55 फीसदी का इजाफा किया गया है। गांव के लोगों का कहना है इस का फायदा तभी बेहतर तरीके से मिलेगा जब बजट सही समय पर लोगों तक पहुंचे।

"मनरेगा का बजट बहुत अच्छा है, सिर्फ अधिकारियों, टीवी और अखबारों के लिए, गाँवों के लिए नहीं। बजट अच्छा आ जाने से कुछ नहीं होता जब मजदूरों को पैसा ही समय पर न मिले। गाँवों में मनरेगा का काम इस बार बहुत बेकार रहा है। पैसा न मिलने के कारण मनरेगा के तहत कोई मजदूर काम नहीं करना चाहता। बजट का कोई लाभ हम लोगों को नहीं मिलता।" उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बीकेटी ब्लॉक के बीभगौतीपूर गाँव के प्रधान माता प्रसाद गौतम बताते हैँ।

बजट मिलेगा तो प्रधान काम कराएंगे। मजदूर घर रहकर काम करना चाहता है।
स्मृति सिंह, जिला अध्यक्ष, प्रधानसंघ बलिया, यूपी

लखनऊ के बीकेटी तहसील अरम्भा गाँव के मनरेगा के मजदूर पिन्टू कुमार बताते है, "बजट से हमको क्या लाभ है जब पैसा हमें समय से नहीं मिलता। पिछला बजट में मनरेगा की मजदूरी का पैसा नहीं बढ़ा।" कन्नौज के सैयदपुर सकरी गाँव की प्रधान गुड़िया बेगम बताती हैं, ‘‘मनरेगा के तहत गांव में काफी काम होते हैं। बजट काफी होना चाहिए। प्रधानों के हाथों में अधिकार बढ़ाने चाहिए।" हरदोई जिले के भरावन ग्राम पंचायत के प्रधान सुधीर कुमार पाण्डेय बताते है, "चुल्हे पर तवा चढ़ा कर मनरेगा मजदूर काम करने जाता हैं, लेकिन जब समय पर पैसा नहीं मिल रहा तो उसकी रोटी कैसे पकेगी। अब पैसा दिल्ली से आता है तब भी समय पर नहीं मिलता तो इस बढ़े बजट से क्या लाभ होगा।"

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने पिछले साल के करीब 12,581 करोड़ रुपए के बकाये का भी निपटारा किया है। इस साल कार्यक्रम के सुगम संचालन के लिए मंत्रालय ने बजटीय आवंटन के अतिरिक्त 10,000 करोड़ रुपए भी मांगे हैं। सूत्रों के अनुसार इस साल काम की मांग अपेक्षाकृत अधिक है क्येांकि कुछ क्षेत्र अब भी सूखा प्रभावित हैं।

उत्तर प्रदेश में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) के तहत 163.48 लाख जॉब कार्ड दिए गए हैं, जबकि मजदूरों की संख्या 237.03 लाख है। उत्तर प्रदेश में 106.41 लाख मजदूर मनरेगा के तहत सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

बलिया जिले के गढ़वार ब्लॅाक रतसर गाँव की प्रधान अध्यक्ष स्मृति सिंह बताती है, "यहां पर लोगों को बजट तो अच्छा आया है, लेकिन सरकार मजदूरों को समय पर पैसा तभी ज्यादा लाभ मिलेगा। बजट मिलेगा तो प्रधान काम कराएंगे। मजदूर घर रहकर काम करना चाहता है।"

उत्तर प्रदेश में मजदूरों की संख्या 237.03 लाख है फोटो- विनय गुुप्ता

सरकार ने और नए तालाब बनाने के आदेश जारी किये हैं, जिससे पलायन कर रहे मजदूर अब अपने गाँव में ही रह कर रोजगार पा सकेंगे।
कमलेश मौर्या, प्रधान, लालापुर, सूरतगंज, बाराबंकी

बाराबंकी जिले के सूरतगंज ब्लॉक में लालपुर ग्राम पंचायत के प्रधान कमलेश मौर्या, "सरकार ने और नए तालाब बनाने के आदेश जारी किये हैं, जिससे पलायन कर रहे मजदूर अब अपने गाँव में ही रह कर रोजगार पा सकेंगे।" कानपुर नगर के गांव बिधनू के ग्राम प्रधान पवन सिंह चंदेल बताते हैं, "यह बजट कहीं ना कहीं ग्रामीण क्षेत्रों और किसानों को ध्यान में रखकर बनाया गया है और इसमें किसानों और गाँव के विकास को ध्यान में रखा गया है। जहां एक ओर किसानों को ऋण संबंधी रियायत मिली है वहीं गाँव के बेरोजगारों के लिए मनरेगा को और सशक्त करके रोजगार के नए अवसर प्रदान किए गए हैं।"
बजट बढ़ने से ज्यादा हाथों को काम मिलना तय है। यूपी में पिछले दिनों पैसा न पहुंचने से काम प्रभावित हुआ थआ लेकिन दिसंबर में बजट आवटंन होने और नोटबंदी के असर के चलते मनरेगा में काम बढ़ा है। यूपी में मनरेगा की उपायुक्त प्रतिभा सिंह बताती हैं, “ समय पर भुगतान न होने का असर जरुर पड़ा है लेकिन सरकारी काम है तो पैसा मिलना ही है, इसलिए काम जारी रहता है। बजट ज्यादा मिलने से हर गांवों के मनरेगा मजदूरों को लाभ मिलेगा।”

अतिरिक्त सहयोग राजीव शुक्ला (कानपुर), अजय मिश्र (कन्नौज) वीरेंद्र शुक्ला (बाराबंकी)

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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