पारिवारिक कलह से कहां आ गई सपा...

पारिवारिक कलह से कहां आ गई सपा...सपा का चुनाव चिह्न। (फाइल फोटो)

लखनऊ। हमें मंजिल तक पहुंचना है इसी को स्लोगन बनाकर 4 नवंबर, 1992 को लखनऊ के बेगम हजरतगंज में जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी तो उन्होंने कहा था कि उन्होंने मुरझाए सोशलिस्टों को नया जोश दिया है। समाजवादियों को अपना घर मिला और अपना कार्यक्रम। नए जोश और तेवर के साथ शुरू हुई यह पार्टी इसी साल अपनी स्थापना का रजत जयंती समारोह मनाने जा रही है। पिछले पच्चीस साल में इस पार्टी ने कई उतार-चढ़ाव के बाद अब जिस दौर से गुजर रही है उससे मुलायम सिंह को अपना पुराना दिन याद आ रहा है। कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है और सपा के साथ यही हो रहा है।

समाजावादी पार्टी को उसकी स्थापना से लेकर अभी तक कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार आशु सक्सेना कहते हैं कि जनता दल को तोड‍़कर मलायम सिंह यादव ने चंद्रशेखर के साथ मिलकर समाजवादी जनता पार्टी बनाई। उसके बाद चंद्रशेखर का साथ बीच मंझधार में छोड़कर अपनी पार्टी बना ली। आज उनकी पार्टी टूट के कगार पर है। उत्तर प्रदेश में जनता दल को तोड‍़कर समाजवादी जनता पार्टी बनाकर साल 1991 में चुनाव में उतरने वाली इस पार्टी को 34 सीटें मिली। लेकिन इससे से 26 लोगों विधायकों को अपने पक्ष में करके मुलायम सिंह यादव ने अपने पक्ष में करके समाजवादी पार्टी बना ली।

पहली बार इलेक्शन में उतरकर ही 109 सीटों पर सपा ने किया कब्जा

समावादी पार्टी को गठन करने के बाद मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी की ताकत पहले ही चुनाव में दिखा दिया। उत्तर प्रदेश के साल 1993 के विधानसभा चुनाव में पहली बार सपा चुनाव मैदान में उतरी। बसपा के साथ गठबंधन करके इस चुनाव में सपा ने 109 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं उसकी गठबंधन सहयोगी बसपा को 67 सीटें मिली। दोनों पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई। 4 दिसंबर 1993 को मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन 1 जून 1995 को गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा-बसपा का गठबंधन टूट गया और मायावती पहली बार 3 जून 1995 को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी।

लेकिन 1996 में राष्ट्रीय फलक पर उभर गए मुलायम

यूपी में मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाने के बाद भी समाजवादी पार्टी ने11वीं लोकसभा के लिए साल 1996 में हुए आम चुनाव में यूपी में 16 सीटों पर इसके सांसद चुने गए। मुलायम सिंह यादव एचडी देवगोड़ा की राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में रक्षामंत्री बन गए। जिसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकारता बढ़ी। इसके बाद दो साल बाद हुए 1998 के मध्याविध चुनाव में सपा की और ताकत बढ़ी और 18 की जगह इसके 20 सांसद चुने गए। इसके एक साल बाद 1999 में हुए आम चुनाव में सपा ने अपने जनाधार का बढाते हुए 26 सीटों पर जीत दर्ज कर ली।

साल 2002 के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बन गई सपा

समाजवादी पार्टी के इतिहासा और वर्तमान पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार मधुरेन्द्र दि्वेदी ने कहा कि मुलायम सिंह की पार्टी की ताकत तेजी से बढ़ने लगी। साल 2002 के यूपी विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी को प्रदेश में सबसे ज्यादा सीटें मिली। इस चुनाव में बीजेपी जहां 88 सीटों पर सिमट गई वहीं सपा को अपने दम पर 143 सीटें मिली। लेकिन बीजेपी और बीएसपी ने गठबंधन करके सरकार बना ली। उनका साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चला और मुलायम सिंह यादव तीसरी बार 29 जुलाई 2003 को राज्य के मुख्यमंत्री बने। उनकी सरकार साल 2007 तक चली। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा ने लोकदल के साथ गठबंधन के करे चुनाव में उतरी और सपा को अकेले 36 सीटों पर जीत मिली। जिससे केन्द्र में मुलायम सिंह की ताकत बढ़ी।

लेकिन सपा को मिली 2007 में सबसे बड़ी हार

सपा के चुनावी इतिहास में पार्टी को सबसे बड़ा झटका साल 2007 के चुनाव में मिला जब बीएसपी ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और सपा सैकड़ा का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई और 99 सीटों पर सिमट गई। इस हार से सपा में निराशा का भाव पैदा हो गया। लोगों को लगा कि अब सपा का दोबारा प्रदेश अपनी राजनीतिक हैसियत नहीं बढ़ा पाएगी। लोग मुलायम सिंह को चुका हुआ मानने लगे। लेकिन अगले ही चुनाव में सपा ने चमत्कार कर दिया।

साल 2012 में पार्टी को मिली सबसे बड़ी जीत

पार्टी के हताश और निराश कार्य कर्ताओं में जोश भरने के लिए साल 2012 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने साइकिल लेकर जनता के बीच उतरे और साल 2012 के चुनाव में सपा को प्रदेश में सबसे बड़ी जीत मिली। और पार्टी ने अपने दम पर 225 रिकार्ड सीटें जीती। अखिलेश यादव राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। लेकिन 4 साल बीतते ही इस पार्टी में विवाद बढ़ने लगा और अब जब पार्टी साल 2017 के चुनाव में जाना है पार्टी में बिखराव का खतरा पैदा हो गया है। जिसको लेकर मुलायम सिंह यादव और उनके समर्थक चिंतित हैं।

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